रविवार, नवंबर 30, 2014

छोटी छोटी कहानियां और जिंदगी का सफर

  छोटी छोटी कहानियां कभी-कभी इतना सुखद एहसास देताी हैं, जिन्हें बताना मुश्किल है। बस इसे समझा जा सकता है। खासकर तब, जब आप कई तरह की परेशानी और तनाव से घिरे होते हैं। इनमें कई तनाव इसलिए होते हैं, क्योंकि लोग आपको समझ नहीं पाते, और आप उन्हें समझा नहीं पाते। इन हालातों से निपटने के सबके अपने-अपने तरीके होते हैं। इसके लिए मैं या तो कोई किताब पढ़ने लगता हूं या टहलने निकल जाता हूं। 
    ऐसे ही मानसिक तनाव और ज़िंदगी की गाड़ी को दिशा देने के बीच बड़े दिन बाद छोटी-छोटी कहानियों को पढ़ने का मन कर गया। इस बार कहानी पढ़ने के लिए किसी किताब की जगह इंटरनेट का रूख किया। इंटरनेट का ब्राउजर खुला ही था कि जिंदगी की कहानियां चारों तरफ बिखर गईं। ये वो कहानियां थी, जो दस साल  पहले लिखी गई थीं। इन कहानियों में देश भी है और विदेश भी। साथ ही है भारत और पश्चिम की कशमकश भी। ये वो कशमकश है, जो भी आज कस्बे औऱ छोटे शहर से निकल कर बड़े शहरों के बदले समाज में फंसे लोगे के जेहन में भी फंसी हुई है। पढ़ते-पढ़ते मन भी कहानियों के बदलते किरदारों के साथ जुड़ने लगा।  
   बारिश में भीगे किसी के खोज में लगे किसी मुसाफिर की कहानी, उम्र की सांझ में उलझनों से उलझते लोग, बच्चों के बीच पिसते मां-बाप, सपनों के राजकुमार का इंतजार करती प्रौढ़ स्त्री, अपनी ही शर्तों पर जीवन में अकेले रह जाने वाले अभिशप्त लोग...औऱ ऐसे अनेकों किरदारों से रूबरु होते खुद आप। ये क्षण अजीब से एहसास वाले होते हैं। जिन्हें आप जीते हैं, जब कहानियों के बीच होते हैं।
    इन किरदारों की कहानियां जरुरी नहीं कि आसपास ही हों। कहानी में भटकती भावनाएं, उलझने, सवाल, ये सब कई बार आपके जीवन के ही टुकड़े होते हैं। वो भटकन, वो इंतजार, कलेजे को चीरते सवाल, खुद का मूल्याकंन करते हुए भी नतीजे को खारिज करने की जिद, सबकुछ खुद के ही अलग-अलग रूप होते हैं। कितना सच होता है इन कहानियों में। इन कहानियों में वो कड़वा सच होता है, जिससे कई बार हम जीवन में मुंह चुराते हैं, मगर कहानियों में जी खोलकर मिलते हैं। 
     पढ़ने और घूमने के अपने पहले शौक में मुझसे जीवन दिल खोकर मिलता रहा है, बिना किसी दुराव-छुपाव के। पर क्या शत-प्रतिश्त पूरी ईमानदारी के साथ में उससे मिल पाता हूं? जवाब है बिल्कुल नहीं। कई बार मैं मुंह चुरा लेता हूं अनेक लोगो की तरह। कभी शब्दों में बयां इन सच की पक्की सड़क के किनारे-किनारे चलकर बच निकलने की जुगत निकालता हूं। कई बार इन शानदार सड़कों पर आराम से फूल स्पीड में दौड़ पड़ता हूं खुशी-खुशी। यही ज़िंदगी है और यही कहानी है मेरी, आप की, और उन सब की, जो कई बार चोर नजरों से, तो कभी आंखों में आंख डालकर, प्यार से ज़िंदगी की तरफ देखते हैं। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...