शुक्रवार, दिसंबर 12, 2014

क्यों सरेआम घूमते हैं स्त्री देह के भूखे दरिंदे?

    
एक रेप होता है और लोग धुंआधार भाषणबाजी करने लगते हैं। कहीं नेता तो कहीं विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग। सवाल ये है कि ये आग तभी क्यों लगती है  जब कोई मध्यमवर्गीय या क्रीम जॉब करने वाली वाली लड़की या फिर पॉश इलाके में कोई लड़की रेप का शिकार होती है? या फिर ऐसी ही किसी घटना के आसपास घटने वाली किसी लो प्रोफाइल परिवार की बच्ची के साथ घटित रेप पर ये सारी कवायद क्यों होती है? ये आंदोलन तबतक क्यों नहीं चलता जबतक सरकारी अमला सुरक्षा उपायों को पूरी सख्ती से लागू नहीं करता।
    ये ठीक है कि बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराध पूरी तरह रोके नहीं जा सकते, लेकिन ऐसे वारदातों में कमी लाई जा सकती है। मौजूदा कानून इन वारदातों पर लगाम लगाने के लिए काफी है। पर सवाल है कि कानून का पालन करवाने में सरकारी अमला घोर लापरवाही क्यों बरतता है? एक आदतन अपराधी आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस औऱ करेक्टर सर्टिफिकेट हासिल कर लेता है, मगर इसका पता तबतक नहीं चलता जबतक वो पुलिस की पकड़ में नहीं आता। 
     आज सॉफ्टवेयर की दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। बावजूद इसके देशभर के अपराधियों का डाटा एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि चाहें तो चंद महीने में देश के अधिकांश थानों को ऑनलाइन किया जा सकता है। अगर ऐसा हो जाए तो कोई अपराधी ड्राईविंग लाइसेंस, राशन कार्ड  या पासपोर्ट नहीं बनवा पाएगा। मगर इसपर पर भाषण झाड़ने के अलावा अबतक खास काम नहीं हो सका है। हां इसपर काम जरूर हुआ है, पर जो भी हुआ है वो काफी देर से।
  कोई वारदात होने पर अक्सर लोग डायलॉग मारते हैं कि अपराधी भीड़ के सामने से अपराध करके निकल गया, पर कोई उसे रोकने आगे नहीं आता। ये डायलॉग मारने वाला कोई शख्स या सरकारी अधिकारी इस सवाल का जवाब नहीं देगा कि आवाज उठाने वाले की सुरक्षा का जिम्मा कौन उठाएगा? अगर विरोध करने वाले आदमी को अपराधी मार देता है, तो उसके परिवार को कौन पालेगा? कहने को गवाह की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस औऱ प्रशासन का होता है, पर हकीकत ये है कि कई मामलों में गवाहों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है। दोषी समाज भी है। अक्सर ऐसी मौत होने पर समाज उलटा नसीहत देता है कि दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की जरुरत क्या थी।
    समस्या इतनी ही नहीं है। हमारे देश में हर जगह दलालों का बोलबाला है। चंद रुपए देकर इन दलालों से कोई भी काम करवाया जा सकता है। ये दलाल पैसे लेकर किसी का भी राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि बनवा देते हैं। इन्हीं दलालों की मेहरबानी से लाखों बांग्लादेशी घुसपैठिए इलेक्शन कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाकर भारत के नागरिक बन चुके हैं। हद तो ये है कि ऐसे घुसपैठिए और कई बार पकड़े भी जाते हैं, लेकिन ये सभी सेंट्रलाइज डाटा न होने का फायदा उठाकर दोबारा घुसपैठ कर जाते हैं। अगर पता भी चल जाए कि तो भी दोबारा घुसपैठ करने वाले को कोई कड़ी सजा नहीं दी जाती। आखिर अपराध में लिप्त घुसपैठियों को सीधे गोली क्यों नहीं मार दी जाती?
    सारे देश की सड़कों का नक्शा मोबाइल पर उपलब्ध है। बावजूद इसके हर गांव की डिटेल एक क्लिक पर उपलब्ध नहीं है। आखिर नकली इलेक्शन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाले दलालों औऱ सरकारी कर्मचारियों को कड़ी सजा क्यों नहीं होती? लोग दलाल का सहारा इसलिए भी लेते हैं, क्योंकि सरकारी बाबू ईमानदारी और तेजी से कामो का निपटारा नहीं करते।
    जाहिर है सिर्फ जबतक कई चीजों को सुधारा नहीं जाएगा, तबतक अपराधों पर कारगर लगाम नहीं लग पाएगी। रेप पीड़ित को न्याय दिलाने के नाम पर हल्ला मचाने से कुछ खास नहीं होने वाला। ये घटनाएं घटती रहेंगी, शाम होते ही सड़क पर बैखोफ चलना एक लड़की के लिए सपना बना रहेगा..औऱ सड़कों पर स्त्री देह के वहशी शिकारी दरिेंदे बैखोफ घूमते रहेंगे। 

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