शुक्रवार, दिसंबर 26, 2014

Merry Christmas..क्यों भूल जाती है सुमुधुर घंटी की आवाज

आज क्रिसमस है .....खूबसूरत सा त्यौहार जहां सांता आता है..बच्चों के लिए उपहार लाता है....खासकर बच्चों को इसका इंतजार ज्यादा रहता है...लगता है काश सच में कोई सांता होता..हर बच्चे के लिए खुशियां लाता....चाहे पेशावर का बच्चा होता....चाहे असम का...चाहे वो बच्चा काले रंग का अमेरिका में होता.....जिंगल बेल की आवाज कान में पड़ती है तो कुछ ऐसा ही सुकुन होता है मुझे जैसे मंदिर कि घंटियों की होती है...लगेगी भी..आखिर बेल भी तो घंटी ही होती है....पर ये घंटी बचपन से बड़े होते होते सुननी क्यों बंद हो जाती है...पता नहीं। हो सकता है ऐसी कोई घंटी उन लोगो ने नहीं सुनी होगी या बड़े होने पर भूल गए होंगे ..जो पेशावर में...असम में बच्चों में मौत बांट रहे थे...तभी तो उनके हाथ नहीं थर्राये हथियार चलाते वक्त..वरना उनके हाथों में बच्चों के लिए उपहार होते...मौत बांटती गोलियां नहीं चलती उनके हाथों से...
होता है ऐसा जब लोग बहूत कुछ भूल जाते हैं...त्यौहार तकलीफ को भूलाकर खुशियां बांटने के लिए होता है..पर शायद कई लोगो को दूसरों को तकलीफ देकर मजा आता है...तभी तो दिल्ली की सड़कों पर आमतौर पर नमाज के बाद....गुरूपूर्व के बाद...होली के दिन....मोटरसाईकिल सवारों का कारंवा निकलता है.....कानून की धज्जियां उड़ाते हुए....ये कारवां ये भूल जाता है कि आसपास की गाड़ियों में उनके मां-बाप सरीखे बुजुर्ग भी होते हैं...खैर ये सोचना तो उनका काम नहीं हैं...ताकत का प्रदर्शन करने का घटिया तरीका यही होता है...त्यौहार बदनाम हो तो हो...मोटरसाईकिलों पर का ऐसा बेगैरत लोगो का कारवां क्रिसमस की रात दिल्ली की सड़कों पर अबतक नहीं देखा है मैने...कारवां होता है..पर आमतौर पर शांत....
     फिलहाल व्हाट्स अप पर काफी बधाई बाटं चुका हूं....ऑफिस में बैठ कर किया भी क्या जा सकता है? आज प्रार्थना का दिन है...तो आज के दिन मैं यही प्रार्थना करता हूं कि हिंदूकुश की पहाड़ियों की तलहटी में...उसके आसपास बसे जाहिल औऱ जंगली लोगो के कबीलों में ये घंटी बचपन से बजे....ताकि कोई बचपन बर्बाद न हो.....ताकि वो बड़े होकर हाथों से मौत बांटता न फिरे....पर क्या ऐसा हो सकता है....क्या सदियों से एक ही रवैया अपनाए कबीले बदल सकते हैं..क्या सांता वहां के बच्चों के पास नहीं पहुंच सकते? क्या वहां परियां बच्चों को कहानियों में नहीं मिल सकती...क्या....क्या...क्या...क्या...आखिर क्यों नहीं..???????????????

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...