मंगलवार, फ़रवरी 03, 2015

ये कैसा सिलसिला है पिताजी?

आज पिताजी को गए पूरे चार साल हो गए। आज ही चाचाजी का ग्यारहवां भी है। अजीब संयोग है। दो महीने पहले पूरे खानदान की सबसे सम्मानित बुजुर्ग चाचाजी का स्वर्गवास हुआ था। एक अजीब सा सिलसिला बन गया है पिताजी के जाने के बाद से। 2011 में पिताजी के स्वर्गारोहण के बाद से हर साल कोई न कोई बुजुर्ग, परिवार से विदाई लेता जा रहा है। लगता है जैसे एक पूरी पीढ़ी ने बारी-बारी पिताजी के पीछे जाने का समय तय कर लिया था। चार साल में पिताजी समेत पांच लोग विदा ले चुके हैं। दो महीने पहले पूरे रिश्तेदारी की सबसे सम्मानित औऱ सबसे बड़ी चाची ने भी अलविदा कहा था। हालांकि वो पिताजी से उम्र में बड़ी थीं। यानि उन्हें जोड़कर पूरे छह लोग नश्वर दुनिया से हरिधाम चले गए हैं।
मेरे खानदान की ये वो पीढ़ी थी, जिसने कम से कम किसी का बुरा करने की नहीं सोची। जिसने जात-पात से उठकर ज्ञान को तरजीह दी। कबीर के दोहे 'जात न पूछो साधु की' को पूरी तरह से जिया। मेरी प्रमाणिक जानकारी के मुताबिक पांच पीढ़ी से हमारे खानदान में ये परंपरा चल रही है। यानि पिताजी के परदादा के समय से। हमारे परिवार में पिताजी ने ये परंपरा शानदार ढंग से निभाई।ये वो पीढ़ी थी, जो अपने से बड़ों का आदर करती थी। पिताजी की ये पीढ़ी किसी मुद्दे पर असहमति होने पर इसे जता देती थी, परंतु इसका ख्याल हमेशा रखती थी कि बड़ों का अनादर न हो। ये मैंने अपने चाचाओं औऱ सभी बुआओं के स्वभाव में देखा। कभी कोई पिताजी के सामने ऊंची आवाज में नहीं बोलता था। न ही पिताजी को बड़ी बुआ के सामने मैंने कुछ बोलते हुए सुना था।
हर पंरपरा को परिवार ही बनाता और बिगाड़ता है। कई परिवार की पहचान ही कुछ परंपराओं के कारण है। अगर परंपरा स्वस्थ हो, तो उसे अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाना चाहिए। पिताजी हमेशा कहा करते थे कि व्यक्तिगत कमियों के बाद भी कई परंपराएं निबाही जा सकती हैं। उनके अनुसार व्यक्तिगत कमजोरी आपकी है, मगर परंपरा परिवार औऱ समाज की पहचान होती है। इसिलए इन्हें संभाल कर, जरूरत पड़े तो संवार कर, अगली पीढ़ी को सौंपना चाहिए। उनके अनुसार अगर परंपरा बेड़ियां बनने लगे, तो उसमें बदलाव होना चाहिए। मगर बदलाव धीरे-धीरे औऱ सहज तरीके से आए, तभी वो ठोस होता है। 
बड़ा पुत्र होने के नाते पिताजी ने अपने संस्कारों को बेहतरीन तरीके से संभाला। तभी हमारे दो कमरे के मकान में चपरासी से लेकर देश के राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुकी शख्सियत का डेरा रहा। अपने समय के कई बड़े लेखक कवि से लेकर बड़े राजनीतिज्ञ से पिताजी कि दोस्ती रही।इसी विरासत के बलबूते पिताजी अलग-अलग तबके के बीच सामंजस्य आसानी से बिठा पाए। यही इकलौती चीज है जिसके बारे में मैं दावे से कह सकता हूं कि इसे निभाने में कितना कष्ट होता है। 
पिताजी के अनुसार हर इंसान एक स्वतंत्र ईकाई के बावजूद बिना समाज के अधूरा है। उनका कहना था कि कभी ये मत सोचो कि मैंने उसके लिए कुछ किया है, तो वो मेरे या मेरी संतान के लिए कुछ करेगा। ये एक बेहद सुलझी औऱ ऊंची सोच है। खैर इस सोच को जीवन में अक्षरश उतारना मेरे बस में कभी नहीं रहा। शायद इसलिए क्योंकि मैं समझता हूं कि अगर कोई समाज के लिए कुछ करता है, तो उसका इतना हक तो बनता है कि समाज उसे भूले नहीं।

पिताजी के जाने के बाद के भावानात्मक झंझावतों से मैं निकल चुका हूं, पर मैंने इससे निकलने में देर कर दी। नतीजा बीमारी गले लग चुकी है। हालांकि बीमारी सावधानी हटी, दुर्घटना घटी वाली टाइप की है, इसलिए ज्यादा परेशान नहीं होता। बस सोचता हूं कि क्या कभी भविष्य में विरासत में मिली कोई एक परंपरा को आगे बढ़ा कर जा पाउंगा?

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