बुधवार, मार्च 11, 2015

महिला दिवस-ये मार्किटिंग फंडा नहीं

   बचपन में पढ़ा था कि हर सफल आदमी के पीछे एक महिला का हाथ होता है। बड़े हुए तो ज्ञान मिला कि हर असफल आदमी के पीछे दो महिलाएं होती हैं। कुछ और मेच्योर यानि परिपक्व हुए तो पता चला कि असफल आदमी के पीछ दो क्या तीन, चार पांच महिलाएं भी हो सकती हैं। वैसे सफल पुरूष के पीछे ज्यादातर उसकी पत्नी का जिक्र होता है। माता का जिक्र शायद इसलिए नहीं होता, क्योंकि मां अक्सर बेटे को सफल ही बनाने की चेष्टा करती है। वो तो पत्नी होती है जो घर को स्वर्ग बनाती है और पति को....(खुद भर लें...अपने-अपने हिसाब से) पर ज्यादा दुखी न हों पुरूष। 
    पत्नी भले न माने पर बेटी अपने जीवन में पिता का रोल कबूल करती है। चाहे असफलता हो या असफलता, इसके लिए पिता ही जिम्मेदार होते हैं। बेटियां इस बात को अक्सर कबूल करती हैं। अब चाहे सायना नेहवाल हों या सानिया मिर्जा, या फिर दीपिका कुमारी, इन सबको उनके पिता ने अपना सबकुछ झोंक कर सफलता के मुकाम पर पहुंचाया। सफलता भी ऐसी जिसे पर देश के लोग गर्व से सीना चौड़ा करके घूमते हैं।  
     पति नामक प्राणी भले पत्नी प्रताड़क के रूप में प्रसिद्ध हो, पर ये भी सच है कि कई महिलाओं की सफलता में उनके पति का योगदान कम नहीं होता। विश्वास न हो तो हमारी बॉक्सर क्वीन मैरी कॉम से ही पूछ लें। उनके पति ऑनलेर उनके कोच है, दोस्त हैं, और साथ ही घर औऱ बच्चे भी संभालते हैं। दो-तीन साल पहले मेडिकल की परीक्षा में टॉपर में शामिल एक महिला ने बताया था कि उसकी सफलता के पीछे उसके पति औऱ ससुरालवालों का हाथ हैं। ऐसे ही कई पतियों ने अपनी पत्नी को किडनी देकर उनकी जान बचाई है। मगर ये पति बेचारे समाज की नजर में नहीं आते। कोई बात नहीं दोस्तों कभी न कभी तो समय इन सबका इतिहास भी लिखेगा। 
    आप सोच रहे होंगे कि महिला दिवस पर पुरूषों का रोना रो रहा हूं। दरअसल ऐसा नहीं है। कुछ दिन से महिला दिवस के नाम पर उनके संघर्ष औऱ आंसूओं की खबरें लाइन लगाकर देख रहा हूं। सफल महिलाओं की कहानी में पुरूष किरदार लापता दिखे तो सोचा चलो जरा पुरूषों के पक्ष में कुछ ज्ञान बघार दूं। साथ ही कई लोगो को लग रहा है कि महिला दिवस भी मार्किंटग कंपनियों का फंडा है। इन अकल के अंधों का कहना है कि हर दिन महिला की इज्जत करो, तो ये विदेशी त्यौहार नहीं मनाना पड़ेगा। इन अकल के अंधों में महिलाएं भी शामिल हैं। जबकि हकीकत में महिला दिवस मुख्य रूप से महिलाओं को वोट के अधिकार को पाने की लड़ाई के साथ 1910 में शुरू हुआ था। अंग्रेजी कैेलेंडर की 8 मार्च को 1917 में रूस में महिलाओं ने रोटी औऱ कपड़े के अधिकार के जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। बाद में उसी दिन को महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
     इस आंदोलन से हमारे स्वतंत्रता सेनानी भी प्रभावित थे। तभी महिलाओं को वोट का अधिकार समेत हमें कई अधिकार आज़ादी के साथ मिल गया थे। हमारे अनुभवी नेताओं ने तभी कह दिया था कि हमने संविधान बना दिया है, अब ये देश चलाने वालों पर निर्भर करता है कि वो कितने सफल होते हैं। 
       तो दोस्तों फिलहाल अबकी बार ज्ञान की ये बकबक आसपास मौजूद अकल के अंधों को बता दें। ये भी बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पूरी दुनिया रूक कर ये देखती है कि 100 साल पहले शुरू हुआ संघर्ष, क्या अपने मुकाम तक पहुंच गया है या अभी कई कदम औऱ चलना बाकी है। 

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