मंगलवार, अप्रैल 21, 2015

किसान बचाओ किसान बचाओ..पर कब बचाओगे?

देश में  किसानों की हालत कब सुधरेगी, ये पता नहीं है। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि किसान बदहाल हैं। गांव में कई किसान बदहाल दिखते थे, पर उनके चेहरों पर प्रसन्नता कई बार दिख जाती थी। हो सकता है ये हालत उन गांवों में हो, जहां के किसान मेरे घर आते थे। पैसे की कमी के बाद भी किसान या मजदूर प्रसन्नचित्त दिखते थे। उन दिनों जितने भी खेत में काम करने वाले मजदूरों से मिला, वो शहरों में आते थे, पर अक्सर गांव के खुशहाल समय को याद करते थे। कुछ पैसे कमाकर वापस गांव लौटने की बात करते थे। कई छोटे किसानों की  खुशहाली पैसों की नहीं थी। शायद तब भौतिक सुख सुविधा के पीछे भागने की ललक नहीं थी। तब इतनी तरक्की देश के शहरों ने भी नहीं की थी। कई ऐसे होते थे जिनके पास खेती की पर्याप्त जमीन होती थी, औऱ उसकी देखभाल के लिए गांव में परिजन होते थे। घर के बाकी लोग ऐसे में अतिरिक्त भौतिक सुविधा के लिए शहरों का रूख कर लेते थे।
     पिछले 25 साल में देश की तस्वीर बदल गई है। ठीक तब से जब से मनमोहन सिंह की नीतियों पर देश चलने लगा। तेजी से देश में भौतिक तरक्की नजर आने लगी। इसी दौर में हरित क्रांति के सही तरीके से अमल में न आने के कारण खेती के नुकसान भी दिखने लगे। आधुनिक होने की ललक गांवों में बढ़ने लगी। हर जगह तरक्की के निशान गांवों में नजर आने लगे। शहर की तरफ मजदूरों का पलायन अपनी जिंदगी को सुधारने के लिए तेजी से हुआ। इस समय में शहरों में आए लोग अपने गांव के किसी प्रभावशाली लोगो के घरों के मोहताज नहीं रह गए। शिक्षा के साथ-साथ पैसे हाथ में आने लगे।
    चेहरे पर सहज मुस्कान की जगह भौतिक सुविधा से उपजे अभिमान ने ले लिया है। बरसों पहले एक विज्ञापन आता था कि अमुक टीवी का आपके पास होना, निश्चित रूप से पड़ोसी को जलाएगा, यानी वो कुढ़ेगा। अब ये कुढ़ना हमारे समाज का गुण बन गया है। हम अब पड़ोसी से, अपने परिवार वालों से कुढ़ने लगे हैं। 
आज लोगो के पास मोबाइल है। लोगो के पास पहले कि तुलना में ज्यादा पैसा और सुविधाएं हैं। लेकिन जो नहीं है वो है खुशी। वो प्रसन्चित्त चेहरे अब आपको शहरों में तो छोड़िए गांव में भी नहीं देखने को मिलेगा।
फिर एक परिवर्तन भी साफ दिखने लगा। जैसा कि हर चीज के अच्छे और बुरे नतीजे सामने आते हैं।अच्छी चीजों के बुरे असर को कम करने की कोशिश हर मुल्क में हुई। समाजिक, राजनीतिक औऱ पारिवारिक जैसे हर मोर्चे पर। बदकिस्मती से हमारे देश में इस बुराई को कम करने के लिए कम ही कोशिश हुई।
    गांवों में सहजता नाम की चीज नही रही, ऐसे में गांव की रीढ़ खेती औऱ किसान की हालत तो तबाह होनी ही थी। इस महीने बेमौसम की बरसात ने किसान को तबाह कर दिया है। नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के वर्तमान आंकड़े हमें डराते हैं। आंकड़े कहते हैं कि अब भी पिछले 10 साल में ही कर्ज में दबे किसान परिवारों की संख्या 48.6 फीसदी से बढ़कर 51.9 फीसदी हो गई है। एक किसान परिवार कि औसत आमदनी 6426 रूपए महिला है औऱ कर्जा औसतन 47 हजार रुपए। तमाम लघु बैंकों, सहकारिता बैंकों और राष्ट्रीय बैंकों के जाल के बाद भी 40 फीसदी किसान कर्ज के लिए अब भी सेठों और साहूकारों के पास जाते हैं। सिर्फ 9.14 फीसदी गांवों में ही बैंकिंग सर्विस की सुविधा है।
   इसलिए है कि वहां बिजली भूले-भटके आती है। ग्रामीण भारत की करीब 85 फीसदी आबादी Bore well का पानी पीती है। गांवों में 62.5 फीसदी परिवार चूल्हे पर खाना पकाते हैं। 32 फीसदी आबादी को आज भी इलाज के लिए कम से कम 5 किलोमीटर की दूरी तय करके अस्पताल पहुंचना पड़ता है। 1951 में देश की करीब 50 फीसदी काम करने में सक्षम लोग खेती से जुड़े थे, मगर 2011 में ये घटकर रह गए सिर्फ 24.6 फीसदी। रिपोर्ट के मुताबिक 1991 से 2011 के दौरान हर दिन 2035 किसानों ने खेती छोड़ दी। 
 भारत में गांवों के साढ़े सात करोड़ घरों में बिजली नहीं है। जिन गांवों में बिजली की सप्लाई है वहां हर महीने महज औसतन 8 यूनिट एक परिवार का खर्च करता है। ऐसा
    ये सरकारी रिपोर्ट है। यानी सरकार खुद मानती है कि अबतक हमारे देश की रीढ़ रहे किसान किस बदतर हालात में हैं। आज प्रधानमंत्री मोदी भी किसानों की बदहाली पर गरजते हैं, भविष्य के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी भी। पर गरजने का समय, सवाल उठाने का समय तो कब का गुजर गया है। अब रीढ़ का इलाज करने का समय है, जबतक रीढ़ का इलाज नहीं होगा, तब तक देश तन कर खड़ा नहीं हो सकता। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...