बुधवार, मई 06, 2015

हिला नेपाल, कांपी दिल्ली

नेपाल में धरती डोली और कलेजा हिंदुस्थान का मुंह में आ गया। 25 को नेपाल में भूकम्प ने कहर मचाया, और उसके झटकों से सारा भारतीय उपमहाद्वीप हिल गया। खंडहर बनी नेपाल की राजधानी काठमांडु, और नींद उडी भारत की राजधानी दिल्ली के लोगो की। 80 सेकेंड यानी 1 मिनट 20 सेकेंड के भूकम्प ने नेपाल की चूलें हिला दीं। खंडहर बने काठमांडु की तस्वीरें जैसे-जैसे टीवी और अखबारों में आनी शुरू हुई, भारत में लोगो का कलेजा मुंह को आ गया। गैर आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार नेपाल में 10,000 से ज्यादा मौत हुई है। भारत में भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार 75 लोगो की मौत हो चुकी है।
    सवाल है कि आखिर काठमांडु के जमीदोंज होने पर दिल्ली क्यों परेशान हैं? आखिर लोगों को आपदा से निपटने की अपने देश की क्षमता पर विश्वास क्यों नहीं है? नेपाल के भूकम्प से दिल्ली का दिल क्यों कांप गया? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब सबको पता है। जब सारे नियमों की धज्जियां उड़ाकर मकान और बिल्डिंगें बनाते रहेंगे, तो दिल तो कांपेगा ही। जब रिश्वत देकर काम निकालने की आदत बनी रहेगी, तब ऐसे भूकम्प देखकर दिल तो दहलेगा ही। लापरवाही और नियमों को ताक पर रखने की आदत, हमारे समाज और प्रशासन के डीएनए में समा गया है। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक काहिली, राजनीति और रिश्वत देकर काम निकलवाने की जनता की आदत ने सारे देश का बेड़ागर्क कर रखा है।
    हमारे देश में इमारतों को भूकम्प से बचाने की तकनीक मौजूद है, फिर भी अधिकांश लोग इस तकनीक पर खर्च को फिजूलखर्ची मानते हैं। सारे देश के नगरों का हाल जानने से बेहतर है देश की राजधानी का हाल देख लेते हैं।
कई गगनचुंबी इमारतें खतरनाक इलाके में
     देश की राजधानी होने के कारण देश के कई इलाकों से लोग भारी तादाद में दिल्ली पहुंचते हैं। इन लोगो की जरुरत का फायदा उठाया प्राइवेट कॉलोनाइजरों ने। प्रशासन और नेताओं के साथ मिलकर इन लोगो ने कई अवैध कॉलोनियां बसा दी। ये अवैध कॉलोनियों बसी भी तो बिना भविष्य को ध्यान में रखकर। यहां बिना किसी नक्शे के घर बने। प्रशासन में बैठे बाबूओं ने ऐसे इलाकों में जमीन खरीदने वाले लोगो की मजबूरी का फायदा उठाया और पैसे खाकर बिना नक्शा पास किए मकानों को बनने दिया। जिन इलाकों में नक्शा पास होकर मकान बन सकते थे, उन इलाकों में भी नक्शा पास कराने के लिए पैसा खिलाना पड़ा।       जबकि होना ये चाहिए था कि ऐसे इलाकों में जब कालोनियां बस रही थी, तभी शहर की जरुरत के हिसाब से योजना बनती। कॉलोनाइजरों से जमीन लेकर उसे डेवलेप किया जाता, मगर ऐसा करने की जगह सरकारी कर्मचारी जेब भरने में लगे रहे। आज इन्हीं अवैध कालोनियों में दो तिहाई दिल्ली रहती है। नतीजा ये हुआ है कि दिल्ली और आसपास के इलाको में भूकम्प की पट्टी पर ही घनी आबादी बसी हुई है। दूर-दूर तक खेती की जमीन नहीं बची है।
       यानि सब जानते हैं कि अगर बड़ा भूकंप आया, तो मरने वाले इतने होंगे कि गिनती करना मुश्किल हो जाएगा। कोढ़ में खाज ये है कि राजधानी दिल्ली के कई बड़े सरकारी अस्पतालों की ईमारतें भूकम्प नहीं झेल सकतीं। नतीजा ये होगा कि भूकम्प आने के बाद हालात बदतर हो जायेंगे। यानि प्रदूषित शहरों में तो दिल्ली नंबर एक है ही, जिस दिन भूकम्प आएगा उस दिन दुनिया में भूकम्प में सबसे ज़्यादा मरने वाले लोगो की राजधानी भी बन जाएगी दिल्ली।
     तो ये हाल है देश की राजधानी दिल्ली औऱ उसके आसपास के इलाकों का। जब देश की राजधानी दिल्ली  का सूरतेहाल ऐसा है, जब देश की राजधानी सक्षम होने पर भी घबरा रही हो, तो अपने देश के बाकी इलाकों का भगवान ही मालिक है। आपको जानकार हैरत होगी कि राजधानी दिल्ली किसी समय दुनिया की सबसे हरी-भरी राजधानियों में थी। 9 बार उजड़ने के बावजूद, जब भी दिल्ली बसी, बहुत ही खूबसूरत तरीके से बसी। दिल्ली के हालात बदतर होने तब से शुरु हुए जब से सत्ता जनता के हाथ में आई। महज 60 साल के अंदर जनता, प्रशासन और नेताओं ने मिलकर दिल्ली को दुनिया के प्रदूषित महानगरों की राजधानी बना दिया है। तो अब यही कह सकते हैं कि जाहि विधी राखे भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी..ताहि विधी रहिए।।।।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...