रविवार, मई 31, 2015

हाय हाय ये गर्मी....

    हाय हाय गर्मी....हर जगह यही शोर मचा हुआ है...सिर पर सूरज चाचा पुरे गुस्से से लाल-पीले हो रहे हैं...नीचे जमीन पर लोगो गर्मी से जल रहे हैं। इसके ताप से बचने के लिए लोग तमाम उपाय अपना रहे हैं। घरों में कूलर-एसी से लोग निकलने से कतराने लगे हैं। इनसबके बीच जो पैसा खर्च करने की ताकत नहीं रखते, उन्हें जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। सूरज की गर्मी को न झेल पाने के कारण देश भर में 1100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। वैसे भी हकीकत यही है कि प्राकृतिक कहर में आम लोगो की जान के लाले सबसे पहले पड़ते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में भी दो गरीबों की मौत गर्मी से हो चुकी है। 
   हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि आम लोगो को समझ नहीं आ रहा कि आखिर किसकी शरण में जाएं। गर्मी से बचने के लिए पानी का सहारा होता है, मगर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश समेत कई प्रदेश में गर्मी के आगे खुद पानी का हाल बेहाल है। तालाब, पोखर का पानी गर्मी न झेल पाने के कारण उड़नछू हो चुका है। तपन इतनी है कि कई जगह जमीन पर हरियाली का नामोनिशान मिट गया है। यहां तक कि बर्फ के घर हिमालय की गोद में बसे लोग भी दिन में 42 डिग्री टेम्परेचर झेल रहे हैं। 
    आखिर हो क्या रहा है? क्या  पहली बार सूरज भगवान इतने उबल रहे हैं...या इंसान कि कारस्तानियों ने उसे इस हालात में पहुँचा दिया है? चारो तरफ मचे हुए हाहाकार का जिम्मेदार कौन है? ये भी वो सवाल हैं जिसका जवाब हमें पता है। अंधाधुंध विकास के कारण ये सब हो रहा है। हमारे सिर की छुपी हुई छत यानि वायुमंडल की उपरी परत ओजोन में में छेद हो चुका है। अनुमान लगाया जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय के ग्लेशियर भी 2021 तक पिघल जाएंगे। तब क्या होगा भारत में? तब ये होगा कि बारिश में भारी बाढ़ और गर्मियों में भारी सूखा। 
       सवाल है कि हम क्या कर सकते हैं? दस फुट की दूरी पर ठीक मेरे घर के सामने पार्क में पिताजी ने शहतूत का एक पेड़ लगाया था। उसकी डालियां हमारे गेट तक पहुंचती थी। जिससे 44 डिग्री टेम्परेचर में भी मेरे नीचे वाले फ्लोर में पंखे में भी ठंडी हवा के झोंके आते थे। जबतक पेड़ रहा हमें कूलर तक की जरूरत महूसस नहीं हुई। जबसे वो पेड़ खत्म हुआ है, तबसे नीचले फ्लोर में पंखे की हवा लू माफ़िक हो गई है। हालांकि कूलर इसका बचाव कर रहा है कूलर की शरण में मुझे सिर्फ इसलिए जाना पड़ा क्योंकि मैंने एक पेड़ की शरण नहीं ली। एक पौधा लगाता और तीन-चार साल में वो इतना सक्षम होता कि मुझे कूलर की जरूरत महूसस नहीं होती। 
    इससे बचने के लिए मुझे फिर से एक पेड़ लगाना है, घर के सामने पार्क में। यानि जो कई काम पिता ने किए, उनमें से एक छोटे से अच्छे काम को अपनाना है। भले ही उसमें कहीं न कहीं मेरा स्वार्थ भी हो। इस स्वार्थ में सबका भला है। तो कुछ ऐसे स्वार्थ हैं, तो भी अच्छे हैं। यानि संदेश साफ है। अपनी विरासत को संभालिए, उसे एक अच्छी परंपरा के तौर पर अगली पीढ़ी को सौंप दीजिए। मैं तो अपना रहा हूं, आप अब देखिए, आप क्या कर सकते हैं।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...