बुधवार, अगस्त 26, 2015

याकूब-हत्यारे की फांसी पर इतनी हायतौबा? लानत है

  याकूब जैसे हत्यारे की फांसी पर इतनी हायतौबा क्योंं मची, ये आम भारतीय की समझ में नहीं आया। समझने वाले जानते हैं कि सिर्फ वोट की राजनीति के चक्कर में इतना हो-हल्ला मचा। आखिर 257 लोगो की मौत के जिम्मेदार पकड़े गए 11 हत्यारों में से सिर्फ एक को ही फांसी हुई है। अदालत ने बाकि 10 की फांसी की सजा बिना धर्म देखे उम्रकैद में तब्दील कर दी थी। फिर कैसे याकूब अचानक क्यों मुसलमान हो गया, ये आम लोग समझते हैं। बावजूद इसके धर्म के ठेकेदार नेताओं औऱ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इतना हल्ला मचाया कि आम भारतीय घनचक्कर बन गया है। उनके दिमाम में कई तरह के सवाल घूम रहे हैं। मसलन-
  • एक हत्यारे को झूठ बोलकर सीबीआई अधिकारी भारत लाए तो कौन सा आसमान टूट गया? गद्दारों को साम, दाम, दंड या भेद. यानि किसी भी तरीके से सजा दिलानी चाहिए।  
  • फांसी की सजा पाए 10 की सजा बदलकर उम्रकैद होने पर कठमुल्ले और सेकुलर तारीफ करते क्यों नहीं दिखे? अगर तारीफ की थी तो उनकी आवाज इतनी धीमी क्यों रही, कि आम जनता तक नहीं पहुंच सकी? जबकि जिनकी फांसी की सजा बदली उनमें कई मुस्लिम थे।  
  • आखिर 257 लोगो की हत्या के दोषियों में से एक की मौत पर इतने आंसू क्यों? 
  • याकूब की सजा पर उसके परिवार का दु:ख समझ आता है, पर बाकी लोग क्यों आंसू बहाने कि एक्टिंग कर रहे थे?  भले ही आंसू घड़ियाली थे।
  • आम लोगों को ये समझ नहीं आ रहा कि आखिर उनकी तकलीफों को दूर करने के लिए इतना हल्ला क्यो नहीं मचता?
  • मानवाधिकार कार्यकर्ता और लाखों की फीस लेने वाले वकील झूठे और मामूली केसों में सालों से जेल में सड़ रहे कैदियों के लिए कुछ क्यों नही करते? इसके लिए ये लोग रात को सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं जगाते?
कुछ लोगो ने इस बात पर नाराजगी जताई कि मीडिया चैनलों ने क्यों बाकायदा सूचना दी कि वे दहशतगर्द की मैय्यत नहीं दिखाएंगे? इन लोगो से जरा पूछा जाए कि 
  • कब राष्ट्रीय चैनलों ने आतंकवादियों का अंतिम संस्कार दिखाया है? कई चैनलों ने याकूब की हर खबर दिखाई, सिर्फ उसके अंतिम संस्कार कि खबर नहीं दिखाई। 
  • क्या ये लोग ये बताएंगे कि एक आतंकी के संस्कार में इनकी इतनी दिलचस्पी क्यों थी? अब रिपोर्ट आई है कि याकूब के संस्कार में मौजूद भीड़ अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के इशारे पर पहुंची थी।
  • सवाल ये भी है कि याकूब के संस्कार में मौजूद लोगों पर एक राज्य के राज्यपाल ने नजर रखने का ट्विट किया, तो लोग उनके पीछे क्यों पड़ गए? 
  • उसी दिन भारत रत्न कलाम का अंतिम संस्कार हुआ था, ये सब वहां क्यों नहीं पहुंचे? 
  • एक लेख में बकायदा हताशा जताई गई है कि अब भारत में कलाम होकर ही कोई मुसलमान मीडिया में जगह पा सकता है। ऐसा लिखने वाले को शर्म तक नहीं आई। शायद उसकी नजर में कलाम होना खास इज्जत की बात नहीं है। क्या वो ये कहना चाहते हैं कि कलाम की जगह लोग हत्यारों से प्रेरणा लें?
फांसी की सजा हो या न हो, इसपर राज जुदा हो सकती है। मेरे हिसाब से फासी की सजा न के बराबर होनी चाहिए। फांसी केवल गद्दारों और दूर्दांत हत्यारों को ही दी जानी चाहिए। जब 257 लोगो के हत्यारों में से एक को उसके किए की सजा मिल रही थी, तब फांसी की सजा के औचित्य पर हल्ला नहीं मचाना चाहिए था।
 याकूब की फांसी का विरोध करने वाले पूछ रहे थे कि मीडिया उन्हें क्यों कठघरे में खड़ा कर रहा है?
  • सवाल ये है कि क्या अब आतंकवादी को फांसी से बचाने की पैरवी करने वालों से सवाल भी न पूछा जाए?
  • इनमें से कई हस्तियां भोलेबलम बन कर सवाल कर रहे थे कि वो तो फांसी की सजा का विरोध कर रहे थे?
  • हकीकत ये है कि मीडिया फांसी की सजा का विरोध करने वालों को कठघरे में नहीं खड़ा कर रहा है, बल्कि मीडिया का सवाल ये है कि आखिर एक आतंकवादी की फांसी के वक्त ही इतना हो-हल्ला क्यों मचा? 
  • धनजंय चटर्जी की फांसी के लगभग 10 साल हो गए हैं। इतने साल ये सारे फांसी के विरोधी कहां सोए हुए थे। 
  • याकूब की फांसी पर आज कई नेताओं को बड़ा दुख हो रहा है, पर सत्ता में रहते इन लोगों ने फांसी की सजा खत्म करने का कोई विधेयक संसद में क्यों पेश नहीं किया?
  • आखिर धनजंय चटर्जी की फांसी के वक्त इसी आक्रमता के साथ कोई क्यों नहीं बोला? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि धनजंय चर्टजी एक मामूली चौकीदार था, और उससे वोट की राजनीति करने वालों को कोई फायदा नहीं दिख रहा था? जिसके मरने-जीने से मानवता को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था?
धर्म के ठेकेदार 
ये सारा मसला तब हवा में उछला जब अपने को मुस्लिम धर्म के ठेकेदार कहने वाले नेताओं ने हल्ला मचाना शूरु किया। इन लोगो ने इतनी नफासत के साथ धर्म को एक सजायाफ्ता मुजरिम के साथ जोड़ा कि आम आदमी बुरी तरह से चक्कर खा गया है।
  • ये कहां का तर्क है कि अगर एक अपराधी को सजा नहीं मिली, तो दूसरे को भी न दो।  
  • धर्म को फांसी के साथ जोड़कर आम जनता के बीच जहर घोलने की आखिर कोशिश क्यों कि गई?
  • हद तो तब हो गई जब कई लोगो के साथ मुसलमान नेताओं ने कहा कि मुम्बई धमाका तो विवादित ढांचा गिराने का बदला लेने के लिए किया गया। ये कहकर ये नेता क्या अपनी पूरी कौम को बदनाम नहीं कर रहे?  
याकूब की फांसी पर ऐसा हल्ला मचाया गया कि अब कई लोगो को लग रहा है कि याकूब पूरी तरह दोषी नहीं था और उसे मौका नहीं दिया गया। जबकि याकूब को हर वक्त, हर सुनवाई में अदालतों ने अपनी बात रखने का मौका दिया गया। ये हकीकत है कि देश की जनता राजीव गांधी और बेअंत सिंह के हत्यारों के साथ भी यही सलूक चाहती है जो मुंबई बम धमाके के हत्यारों के साथ होना है। अफसोस ये है कि इसमें भी राजनीति की जा रही है और इसी का फायदा उठाकर बाकी लोग भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं।
अल्पसंख्यक कौन है? क्या इसकी परिभाषा नए सिरे से करने का वक्त नहीं आ गया है। धार्मिक कट्टर वोटों की राजनीतिक करने वालों के बीच हमारे देश में हिंदु-मुस्लमान को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच बांटने का पुराना शगल है। ये काम वो हर स्तर पर करते हैं। अब सवाल ये है क्या-
  • ये सही समय नहीं है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मापा जाए?  
  • 25-30 करोड़ लोगों को आखिर कब तक अल्पसंख्यक कहकर बरगलाते रहेंगे ये सियासतदां?  
  • भारत के बहुसंख्यक हिंदू वर्ग को कट्टर कहने वालों से पूछना चाहिए कि कि अगर बहुसंख्यक इतना ही कट्टर होता तो क्या भारत दुनिया में मुस्लिम आबादी वाला सबसे बड़े मुल्कों में एक होता? 
  • सवाल ये है कि भारत के साथ ही बने पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या कितनी बढ़ी है? 
ये धार्मिक नहीं, देश का मसला है। ये साबित हो चुका है कि अपने को मुसलिम लोगो का ठेकेदार साबित करने वाले लोग पूरी तरह से मुसलमानों को बरगलाने का काम करते हैं। अगर ऐसा नही है तो.. 
  • आंध्र के एक जिले के मुस्लिम बहुसंख्यक होने पर जब मुस्लिम कलेक्टर और पुलिस कप्तान की मांग हुई तो इन मुस्लिम नेताओं और मानवाधिकार के पैरोकार ने उसी तुर्शी और तेजी से आवाज क्यों नहीं उठाई, जितना हत्यारे याकूब की फांसी के विरोध में उठाई।  
  • अवैध बांग्लादेशी भारत में घुसपैठ करके कई सीमावर्ती जिलों का जनसंख्या संतुलन बिगाड़ चुके हैं। उन घुसपैठियों को देश से खदेड़ने की जोरदार आवाज क्यों नहीं उठाते?
  • सवाल ये भी है कि अवैध बांग्लादेशी के खिलाफ जब कोई आवाज उठाता है तो सांप्रदायिक क्यों घोषित कर दिया जाता है? 
  • अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ की बात ही कई धार्मिक सियासतदां मानने से इनकार क्यों करते है? 
  • अवैध घुसपैठियों को भारत में शरण देने वाले को गद्दार मानकर कड़ी सजा देने की मांग क्यों नहीं उठती?  
  • याकूब की जान बचाने वाले सभी लोग उस वक्त चुप्पी क्यों साधे हुए थे, जब यूपीए सरकार में एक ऐसा बिल आ रहा था जिसमें दंगे के दौरान किसी इलाके में बहुसंख्यक आबादी को दोषी ठहराए जाने का प्रावधान रखने की कोशिश की गई थी। 
   क्या इन बातों से समाज में अविश्वास का माहौल नहीं बनता? क्या इससे इन लोगो का दोगलापन नहीं झलकता। सच बोलने वाले हिंदु सांप्रदायिक और मुसलमान काफिर कबतक कहलाएंगे? सवाल इतने हैं, मगर एक का भी जवाब किसी कठमुल्ले टाइप के नेता(हर धर्म के कठमुल्ले) और सो कॉल्ड़ सेकुलर लोगो के पास नहीं है। ये सभी इन सवालों को बेमतलब के सवाल कहकर खारिज कर देते हैं, मगर जब किसी गद्दार को फांसी पर लटकाया जाता है तो इनकी में आग लग जाती है। आजकल सांप्रदायिकता की परिभाषा सिर्फ वोट और सहूलियत के हिसाब से होती है। अगर बहूसंख्यक अपनी बात कहता है, तो उसे सीधे सांप्रदायिक और बीजेपी का चमचा करार दे दिया जाता है। अगर इन सवालों को कोई मुसलमान उठाता है तो वो बेचारा सीधे काफिर करार दे दिया जाता है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...