शनिवार, अक्तूबर 03, 2015

बापू, करते रहो केमिकल लोचा

     बापू 68 साल पहले आप तो चले गए, मतलब कि रूखसत कर दिए गए दुनिया से, फिर भी आपके समर्थकों और विरोधियों के बीच बेमानी बहस चल रही है। जितना आपने अपने जीवन में पढ़ेलिखे-अनपढ़ों को झेला, वैसे ही भारत अब भी झेल रहा हैं। कल आपका जन्मदिन था। आपको तो पता ही होगा। आपने कोई नया जन्म तो नहीं ही लिया होगा, क्योंकि कहते हैं कि महापुरूष दोबारा जन्म नहीं लेते।  
    बापू आप अपने को महान नहीं मानते थे, लेकिन आपके जीवने के दौरान भी आपको भगवान साबित करने की कोशिश होती थी, औऱ आज भी। आपके समर्थक आपको भगवान बनाने पर तुले हुए हैं, और आपके विरोधी आपको गरियाने में। बापू आपके चेलो ने आपके काम करने के तरीकों को जो गांधीवाद नाम दे रखा है, वो दुनिया भर में मशहूर हो चुका है। भले ही आप अपने जीवन में इस बात को सुनकर बुरी तरह से चिढ़ जाते थे।   
    21वीं सदी चल रही है बापू और आपके तरीकों को नए सिरे से पढ़ने कि कोशिशें हो रही हैं। पता नहीं आपने ऐसी कौन सी एलियन की भाषा में लिखा था कुछ। आपकी सीधी-साधी हिंदी में लिखी बातें आखिर लोगो को समझ क्यों नहीं आती? 21वीं सदी में मुन्नाभाई ने गांधीवाद की जगह गांधीगिरी नाम दिया। ये अलग बात है कि आप खुद फिल्मों को वक्त की बर्बादी कहते थे, पर बापू इस गांधीगिरी ने भी भ्रष्टाचारियों को काफी परेशान किया हुआ है।  
   बापू मालूम है सबसे बड़ी समस्या क्या है? बापू अधिकतर आपका आकलन लोग सुनी सुनाई बातों पर करते हैं। जब मैं कोई बात आपके समर्थन में कहता हूं, आपके विरोधी आपको गाली देने लगते हैं। ठीक यही हाल आपके समर्थकों का भी है। आपकी किसी बात के विरोध में बोलते ही, आपके समर्थक गुस्से से लाल हो जाते हैं। दरअसल बापू आपको भगवान बनाने और आपको गरियाने के चक्कर में सब गुड़-गोबर हो चुका है। आप मूर्तियों में सिमट चुके हैं। जहां से अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से लोग आपको याद करने लगते हैं। अगर आपके नाम से सत्ता मिले तो आपको गरियाने वाले भी आपको भजने लगते हैं।  
    बापू आप विरोधियों का भी आदर करते थे, जिस कारण सुभाष बाबू जैसे नेता भी आपकी आलोचना नहीं करते थे। बावजूद इसके आपके समर्थक, आपके विरोधियों को सहन नहीं करते। उधर, आपके विरोधी सुभाष बाबू की हर बात का समर्थन करते हैं, पर आपको राष्ट्रपिता कहे जाने पर आग उगलने लगते हैं। जबकि ज्ञात स्रोतों के अनुसार आपको सबसे पहले राष्ट्रपिता सुभाष चंद्र बोस ने ही कहा था। 
      आपके अहिंसा के सिद्धांत आपके थे। आपने कहा था कि अगर कोई अहिंसा का मतलब समझा, तो वो उसकी अहिंसा हो गई, आपकी नहीं। ऐसे में मेरी अहिंसा का सिद्धांत स्वरक्षा का अधिकार देता है। मैं आपकी आदर्श की हद पार तक पहुंची अहिंसा को नहीं अपना नहीं पाता। आपको इससे कभी कोई समस्या भी नहीं रही। बस आपने अपने विरोध को छुपाया नहीं। अपनी  पसंद-नापंसद की तरह ही आपने अपने जीवन को  भी छुपा कर नहीं रखा, पर आपके कई चेलों ने आपकी कई बातों को पर्दे के पीछे छुपा दिया। आपके सिद्दांतों को गांधीवादी नाम देकर आपके कई सपनों को धता बता दिया है। 
    आपके सोचने का दायरा बहुत विस्त़त था। मैं नहीं चाहता कि आपको भगवान मानकर आपकी हर बात को अपने लिए असंभव बना लूं। अपनी काहिली को ये कहकर छुपा लूं कि हम गांधी की तरह भगवान नहीं हैं। बापू मेरे लिए आप महापूरुष थे, हैं और ताउम्र रहेंगे, जिससे मैं प्रेरणा लेता रहूंगा। कम से कम कुछ मसलों पर डटे रहने की।
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