बुधवार, अक्तूबर 28, 2015

भाड़ में जाए गुलाम अली शो, भारत-पाक दो मुल्क हैं...बस याद रखें

      हमारे देश में कभी-कभी विरोध के नाम पर अति हो जाती है। अति समझते हैं न आप, हद को पार कर जाना। फिर उसके बाद लगता है जैसे बयार चल पड़ी हो अति करने की। राइ का पहाड़ बनाना कहावत शायद इसलिए बनी होगी। गुलाम अली का शो के रद्द होने के मामले में भी यही हुआ। शो रद्द होते ही राजनीति नौटंकी शुरू हो गई। राज्यों के मुख्मंत्रियों में गुलाम अली को बुलाने की होड़ लग गई। हकीकत ये है कि सारी नौटंकी सिर्फ वोटो के लिए हुई। धर्मनिरपेक्ष दिखने की आड़ में सभी मुस्लिम वोटो को साधने में लग गए। शोर मचाने वाले अगर धर्मनिरपेक्ष होते तो तसलीमा नसरीन पर हमले पर भी बवाल मचाते। तसलीमा नसरीन का गुनाह क्या है? बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार कि बात करने पर उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। क्या ऐसा भारत में होता है, एकाध केस को छोड़कर? उल्टा हिंदू अपनी बात कहे, तो वो सांप्रदायिक हो जाता है यहां।
    आतंकवाद और सीमा पर गोलाबारी के विरोध में शिवसेना ने गुलाम अली का विरोध किया था। देखा जाए तो इस मुददे पर सभी राजनीतिक दलों को एक साथ आना चाहिए था। मगर वोटो की राजनीति से कोई ऊपर उठने को राजी नहीं लगता। माना कि शिवसेना हिंदू और मराठी वोटों की राजनीति कर रही थी, पर बात तो सही कह रही थी। आखिर कबतक हम सेक्युलरवाद के नाम पर तुष्टीकरण झेलते रहेंगे। गुलाम अली के कई शो भारत में हो चुके हैं। एकाध शो रद्द होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वैसे भी इन पाकिस्तानी कालकारों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। न ही ऐसे विरोध से पाकिस्तान भारत को आतंकवादियों की सौगात देना बंद करने वाला है। 
    हकीकत ये है कि गुलाम अली के पक्ष में बोलने वाले ज्यादातर नेताओं को इससे मतलब नहीं कि भारतीय कलाकारों और साहित्यकारों को पाकिस्तान में क्या झेलना पड़ता है। खासकर हिंदू कलाकारों और साहित्यकारों को। पाकिस्तान में ज्यादातर हिंदू साहित्यकारों को मेजबान से रूखापन झेलना पड़ा है। पाकिस्तान गए अनेक साहित्यकारों ने इसका जिक्र अपने संस्मरणों में किया है। धर्मनिरपेक्ष लोग पाकिस्तान में नेपथ्य में है। उनकी तादाद इतनी कम है कि उनके प्रयास नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। जो पाकिस्तानियों के दोगलेपन की पोल खोलता है वो वहां बैन हो जाता है। स्वर्गीय अभिनेता फिरोज खान ने पाकिस्तान में ही जब खरी-खरी सुनाई, तो उन्हें बैन कर दिया गया। एक हिंदू क्रिकेटर की मुस्लिम पत्नी को भी पाकिस्तान में क्रिकेट सीरिज के दौरान तिस्कार झेलना पड़ा था।
       सालों से हम पाकिस्तान और भारत में समानता की बकवास सुन रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। समानता सिर्फ दो है। एक कि दोनों देशों में मुस्लिम बहुत हैं और दूसरी समानता भौगोलिक है। जाहिर है जब पाकिस्तान भारत की जमीन पर बसा है तो जमीन और आसमां अलग-अलग कैसे दिखेंगे? 47 के बाद पाकिस्तान से आए मुस्लिम भारतीय नागरिक हो गए, पर पाकिस्तान गए मुस्लिम मुहाजिर हो गए। हालांकि देश के टुकड़े करने वालों को प्रकृति का सबक मिल गया है। भारत में मुस्लिमों की तादाद बढ़ रही है, पर पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्लेआम जारी है। उनकी बहू बेटियों को सिर्फ हिंदू होने का दंड भुगतना पड़ रहा है। हिंदूओं की तादाद बांग्लादेश और पाकिस्तान में महज एक-दो फीसदी रह गई है। 
       आखिर किस समानता की बात करते हैं लोग? समानता की बात करने वालों को हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार नजर नहीं आते। जरा बलोचों का हाल जान लें, तब शायद पता चल जाए कि आजादी और लोकतंत्र का मतलब क्या होता है। पाकिस्तान के सीमांत इलाके को तो हमारे भारतीय नेता ही आग में झोंकने के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे ही सीमांत गांधी ने नहीं कहा था कि उन्हें हमने भेड़ियों के आगे फेंक दिया है। 
    एक तरफ लोकतंत्र, दूसरी तरफ तानाशाही, एक तरफ समानता का अधिकार, दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों पर बलात्कार और अत्याचार, एक तरफ शांति के पुजारी, दूसरी तरफ आतंकियों की फैक्ट्री, आखिर कैसे इन राजनीतिक नौटंकी करने वालों को भारत औऱ पाकिस्तान में समानता दिखती है? हर बार क्रिकेट और संगीत के सहारे रिश्ते सुधारने की कोशिश का ठेका हमने ही ले रखा है क्या? हद है धर्मनिरपेक्ष कठमुल्लों के राग बेसुरा की।

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