मंगलवार, फ़रवरी 02, 2016

पिताजी.....देर से सही, बदल रहा हूं राह

    आज पिताजी को गए पांच साल हो गए....जीवन चल रहा है....मगर उसमें उत्साह की भारी कमी हो गई है। लोगो की गाड़ी आगे चलती है, अपनी पीछे की तरफ चलते-चलते रूक गई है। दरअसल पीछे जाने की जगह बची नहीं है, और पीछे होते-होते आगे की राह मिटती चली गई है। इसलिए अब फिलहाल गाड़ी अटक सी गई है। इन पांच सालों में कोई दिन ऐसा नहीं कि पिता जी याद न रहे हों। विकट परिस्थितयों में डटे रहने का साहस जाने कहां से उनमें आता था। इस साहस की कीमत हर इंसान को चुकानी ही पड़ती है। शायद इसलिए जीवन के अंत में वो उन इच्छाओं की पूर्ति होते नहीं देख सके, जिसकी अपेक्षा उन्होंने अपनी संतानों से की थी। यहां अपनी संतानों से मतलब हम भाई-बहने के अलावा वो सैकड़ों छात्र और समाजिक, कार्यकर्ता और नेता भी हैं।
          हिंदुस्थान समाचार के बंद होने के बाद कितनी मुश्किलों को झेलते हुए पिताजी ने अपने स्वाभिमान को बचा कर रखा था, ये मैने काफी नजदीक से देखा था। वो अंततक अपनी समाजिकता को निभाते रहे थे। अस्सी के दशक की शुरूआत के साथ ही हिंदी की दोनों समाचार एजेंसियां, हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती। दम तोड़ने लगी थी। ये विडंबना ही है कि राष्ट्रभाषा हिंदी में काम करने वाली समाचार एंजेसियों ने भारत में ही दम तोड़ दिया। जिसे बचाने की हवाई कोशिशें बहुत हुई थी। जाहिर जो दशा हिंदी की थी, वो ही दशा इन दोनो एंजेंसियों से जुड़े पत्रकारों की हुई थी। भले ही ये सब पत्रकार राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते थे। हिंदी के साहित्यकार और उस दौर में हिंदी के पत्रकार, दोनो ने ही नाम कमाया, पर लक्ष्मी इन लोगो पर कभी मेहरबान नहीं रही। ये तो हमारा सौभाग्य रहा कि हम दिल्ली में थे। दिल्ली के बाहर हिंदी के पत्रकारों की हालात कितनी बदतर हो गई थी, ये पिताजी के नाम घर पहुंचती उनकी चिठ्ठियों से बयां हो जाता था।  
    हिंदुस्थान समाचार में संवाददाता से जनरल मैनेजर बनने का सफर तय किया था पिताजी ने। विपरित परिस्थियों में किस तरह उन्होंने सफर तय किया होगा, वो उनकी बातों से पता चलता था। देश की दो राजनीतिक विरोधी विचारधार के बीच पिताजी तटस्थ रहते हुए शीर्ष पद पर पहुंचे। तटस्थता का, पत्रकारिता के पेशे का ईमानदारी से पालन करने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। ये पिताजी भी मानते थे, और उनके सहयोगी भी। जनसंघी उन्हें कांग्रसी नेताओं का करीबी होने के कारण कांग्रेसी मानते थे। कांग्रेसियों का मानना था कि जनसंघ के प्रभाव वाली समाचार एंजेंसी में विशेष संवाददाता कोई जनसंघी ही हो सकता है। ये तब का कोई नेता मानने को राजी नहीं होता था कि एक पत्रकार तटस्थ काम कर सकता है। जबकि पिताजी गांधी जी को मानने वाले लाखों आम भारतीय की तरह थे। 
      आज जब सोचता हूं तो हैरत होती है कि देश के सब राजनीतिज्ञों को नजदीक से जानने के बाद भी पिता ने बिना किसी को कुछ कहे अकेले संघर्ष किया। घर पर मेहमानों का तांता लगा रहता था। बावजूद इसके उनके चेहरे पर कभी शिकन नहीं देखी। जाने कैसे इतना साहस उनमें था। उन्होंने हिंदी की सेवा की, हिंदी पत्रकारिता की सेवा की, पर किसी नेता या पार्टी के पिछलग्गू नहीं बने। शायद इसलिए न तो वो स्थान हिंदी में उन्हें मिला, न ही कोई सम्मान। जाहिर है ऐसे योद्धाओं के परिजन जीवन में मिले कड़वे अनुभवोंं के बाद जीवन की राह बदलने में ही भलाई समझेंगे। 

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