सोमवार, फ़रवरी 22, 2016

लो अब देश विरोधी नारे लगाने वाला मुसलमान हो गया !!!!

लो अब कल का कॉमरेड मुसलमान हो गया। कल तक देश के टुकड़े टुकड़े करने का नारा लगाने वाला, अब बिना सरहदों की दुनिया का हिमायती हो गया है। कमाल का ज्ञान प्राप्त हो गया है, गद्दार को शहीद बताने वाले को, फरारी के दौरान।  उसे ज्ञान प्राप्त हो गया है कि वो मुसलमान है, इसलिए निशाने पर है। अब वो लाल सलाम नहीं कर रहा। कह रहा है कि वो मुसलमान है इसलिए निशाने पर है। पहले ये बात उमर खालिद के पिता और सिमी के संस्थापकों में एक इलियास साब ने कहा। जिससे हमें ये ज्ञान हुआ कि भारत में, देश के टुकड़े की मंशा वाले नारे लगाने वाले को निशान तभी बनाया जाता है, जब वो मुसलमान होता है!!! लेकिन ये बाप-बेटे और उनके समर्थक बताएंगे कि जेएनयू छात्रसंघ का नेता कन्हैया क्यों गिरफ्तार है? वो तो मुसलमान नहीं है, फिर कैसे गिरफ्तार हो गया।बाकि के आरोपी छात्रों को किसलिए पुलिस ढूंढ रही है??? लानत है ऐसी सोच वालों पर। अगर इस उमर खालिद और उसके पिता की बात सच होती तो कन्हैया जेल के बाहर होता, और बाकि भारत विरोधी नारे लगाते छात्रों को पुलिस गिरफ्तार करने की तैयारी नहीं कर रही होती। 
       वाह मान गए इलियास साहब एंड उसके सपूत को। इन महाश्यों के हिसाब से अदालत में फैसला होगा कि नारे देशद्रोही थे या नहीं। इसका मतलब ये कि जबतक अदालत फैसला न दे दे, इनके नूरे-चश्म को हमें सड़कों पर भारत माता के टुकड़े-टुकड़े होने वाले नारे लगाते, ठंडे दिल से सुनते रहना चाहिए। मतलब ये कि आपके सामने, आपके टैक्स से चलने वाले संस्थानों में, एक आतंकवादी को, एक गद्दार को शहीद कहा जाता रहे, और आपसे कान में तेल डालकर चुपचाप बैठे रहें। मतलब कि देशद्रोह के नारे के खिलाफ जुबान बंद रखिए, अगर विरोध करने की सोचें तो पिटने के लिए तैयार रहिए। यानि देशद्रोही नारे सुनते रहिए, और नारा सुनते वक्त पार्लियामेंट में शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों की मौत को भूल जाइए। उनकी विधवाओं और बच्चों को भूल जाइए। कश्मीर में आए दिन शहीद होते जवानों को भूल जाएं। वाह ही ये कॉमरेड मिक्स धर्मिक मार्का देशभक्ति। 
      वैसे ये भी अजीब बात है कि अगर आप गुस्से पर काबू न रख सकें और इन्हें पीट-पाट देंगे, तो आपके मुल्क के टुकड़े होने के नारे लगाने वाले ये महारथी, इन्हीं भारतीय अदालतों की शरण लेंगे। तब इनको इस न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा होगा। उसी न्याय व्यवस्था पर जिसके आदेश को ये ज्यूडिशियल किलिंग कहकर गला फाड़ते है, पर इनको पिटना कानून का उल्लघंन होगा। आपको ये पिटें, आपके शहीदों का सरेआम अपमान करें , तो ये कानून का उल्लघंन नहीं होगा। आपके विरोध का मतयब ये भी होगा कि आप हिंदूवादी होंगे, बीजेपी या संघी होंगे, सांप्रदायिक होंगे, किंतु देशभक्त नहीं होंगे। आपके दादे-परदादे आरएसएस की खाकी निक्कर वाले होंगे। इन देशद्रोहियों के हिसाब से सारे भारतवासियों ने देशद्रोहियों के विरोध का ठेका सिर्फ आरएसएस को दे रखा है।      आजकल ऐसे ही तर्क देकर खुलेआम पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने वालों का बचाव किया जा रहा है। बोलने की आज़ादी को भौंकने की आज़ादी समझ लिया गया है। ऐसे ही फिक्सिंग में फंसकर एक समय क्रिकेट टीम के कप्तान और बाद में कांग्रेस के सांसद बने मोहम्मद अजहरूद्दीन ने मुस्लिम कार्ड खेला था
अब देखिए आने वाले समय में इस नौटंकी बाज को कौन सी पार्टी टिकट देती है? भारत में जहां दुनिया में सबसे ज्यादा आजादी है, जहां सिर्फ भ्रष्टाचार से लड़ना है, और विकास की गाड़ी को सरपट दौड़ाने कि कोशिश होनी चाहिए, वहां हमें गद्दारों से निपटने में भी सांप्रदायिक होने का तमगा झेलना पड़ता है।
      हमारे शिक्षण संस्थान हमारे दिए गए टैक्स से चलता है। जहां सालाना 400-500 रूपए में ग्रेजुएट की पढ़ाई होती है।ये तो कमाल है कि हमारे ही पैसे से चलने वाले शिक्षा संस्थान में हमारे ही देश के टुकड़े-टुकड़े होने के नारे लग रहे हैं। इसका खुलेआम विरोध करने पर हमें ही, सांप्रदायिक या पार्टी विशेष का चमचा करार दिया जा रहा है। जाहिर है कि अब समय आ गया है हर टैक्स पेयर को पता होना चाहिए कि उसके दिए टैक्स से जो शिक्षा संस्थान चलते हैं, उनमें कौन पढ़ता है। हमें अपने शिक्षण संस्थानों में खुली स्वस्थ चिंतन परंरपरा चाहिए, बोलने की आज़ादी के नाम पर भौंकने की नहीं।
दिमाग को कई सवाल मथ रहे हैं....
  • क्या सच में धर्म होता है आतंक के पीछे? 
  • पहले कॉमरेड बने रहना, फिर अचानक धर्म की आड़ लेना, क्या दर्शाता है? 
  • क्या आंख बंद करके अपने सहपाठी का समर्थन करते रहना चाहिए? 
  • क्या देशद्रोही नारों का विरोध करने वाला किसी पार्टी विशेष का होता है? 
  • आखिर देशभर के स्टूडेंट क्यों नहीं समझते कि देश रहेगा, तो तुम रहोगे। 
  • आखिर कबतक इसतरह की देश विरोधी बातों को हम सहिष्णु बनकर देखते रहेंगे?
  • आखिर कब स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर समझेंगे?
  • आखिर राजधानी में दंत्तेवाड़ा में मारे गए कई सिपाहियों की मौत पर जश्न मनाने की हिम्मत कैसे हुई इन लोगो को? ऐसे लोगो को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया था?
क्या आपके दिमाग का दही बना रहे हैं ये सवाल? याद रखिए वक्ट तटस्थता दिखाने वालों का भी हिसाब जरूर करेगा।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...