बुधवार, मार्च 02, 2016

ऐ जिंदगी तू क्यों इतनी निरीह सी है....

 
तुर्की के तट पर औंधे मुंह समुद्र तट पर चिरनिद्रा में लीन सीरियाई बालक को देखकर, अपने थकेहारे दिन को समेटकर बिस्तर के हवाले हो रहा था, लेकिन उस तस्वीर में सो रहा बालक मुझे न सोने देने की कसम खाए बैठा था। परेशान हाल, निराश खिड़की के बाहर आकाश को देख रहा था...बैचेन मन उसी आकाश पर ये लाइनें उकरने लग गया...ये कितनी कड़वी हकीकत है कि मासूम मौत को देखने के बाद भी खून पीने वाले पिशाचों के समर्थकों की कमी न देश में है, ना ही विदेश में। ..................
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ए जिन्दगी मैं तुझे यूं
रोता हुआ नहीं गुजारना चाहता
फिर तू क्यों यूं परीक्षा लेती रहती है
क्यों तूझे लगता है कि मैं सोना हूं
जो हर आग में जलकर कुंदन बनेगा
मैं हंसते हुए तुझे जीना चाहता हूं
फिर क्यों दुख नजर आता है
दुख जो चारों तरफ फैला है
एक अनजाना सा डर बन  
हर जाने-अनजाने चेहरे पर 
ये क्यों ठहरा सा दिखता है
ऐ जिन्दगी क्यों तू इतनी 
निरही सी हो जाती है
हर बार मौत इतनी बर्बरता
से क्यों तुझसे जीत जाती है
क्या तू कहीं रहती भी है 
या यूहीं हर बार थकी-हारी
समुद्र के थपेड़ों को झेलती
नन्ही जान में दम तोड़ती है..
बता ऐ जिंदगी
आखिर तू इतनी निरही सी क्यों है....

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