शनिवार, मार्च 26, 2016

होली खेलो, भीग लो जरा झूम लो..


   होली है....भांग है....पिचकारी है..रंग है..गुलाल है....अबीर है....पानी कि बौछार है....तो झूमना बनता है....खुश रहना बनता है। आदमी चार हों, 40 हों...कि फर्क पैंदा ए....इंसान नूं बस मस्त मलंग होना चाहिदा....कम से कम त्योहार के दिन तो जरूर...खिर इसिलए भी त्योहार की परंपरा रखी गई है। रोज की चिकचिक को गोली मारो...थोड़ा हंस लो...थोड़ा गा लो...थोड़ा झूम लो। बाकी सब खेती और मौसम वैज्ञानिकों पर छोड़ दो यार। घर से निकलो, थोड़ा चलो, पड़ोसी को पकड़ो...रंगों। हां भांग उतनी ही पीना जितनी झेल सको..क्योंकि भांग तो भांग है....अंदर जाएगी, तो गुल खिलाएगी ही। सके बाद हंसगो या रोने लगेगो, ये अलग बात है, पर हां इतना तय है कि सब भूलभाल कर झूमोगे जरूर।  वैसे न ही पिओ तो बेहतर है।
     होली पर पानी बचा लो, पानी बचा लो का चाहे जितना शोर मचा लो...पानी की बौछार नहीं तो कुछ नहीं..। हो सके तो पार्क में जाकर हुड़दंग मचाओ...वहां पानी की बौछार आपको भीगो कर सीधे जमीन में चली जाएगी। सालभर पानी बचाने की सोचेंगे, तो त्यौहार पर ऐसा सियापा करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे भी गर्मी आ गई है....कुछ दिन में रात की ठंड भी दिल्ली से विदा हो जाएगी। उसके बाद सीधे जाकर छलांग मारो स्वीमिंग पुल में। 
   पिछले 30-40 साल में दिल्ली के कई तलाबों को पाटकर उसपर तो बिल्डिंग खड़ी कर दी है। जंगलों का सफाया कर दिया है...छोटी-मोटी पहाड़ी को मैदान बना दिया है, तो बारिश होगी कैसे? जो बारिश होती है, उसके पानी को तो नाले का रास्ता दिखा दिया है, जहां से वो यमुना तक पहुंचता है..फिर दिल्ली से नो-दो-ग्यारह हो जाता है...। उसे रोकने का काम तो कोई करता नहीं...। रेन हार्वेसटिंग के तरीके को सख्ती से लागू करवाने की तो कोई सोचता नहीं, लेदेकर होली की बांह मरोड़ने में लग जाते हैं....। ये कोई बात हुई। 
   हमें सारी चीजें मंजूर हैं...पर हमारी होली को तो मत मारो यार...हमारी होली की बांह तो न मरोड़ों..हमारे समाज की निश्छल मस्ती को तो मत कुचलो..। क्या सरकार, प्रशासन या समाज के ठेकेदार इसका जावब देंगे कि अच्छी भली नदियों कैसे नाले में बदल गई? पोखरों को पाट कर सपाट किसने किया? जंगलों को अनाप-शनाप काट कर मैदान क्यों बना दिया? रिश्वत खा-खाकर हमारे पर्यावरण का बेड़ागर्क क्यों कर दिया? कोई जवाब नहीं देगा, हमें पता है। खाली-पीली भाषण झाड़ देंगे नेता और सेलिब्रिटी। काम एक न करेंगे ये पर्यावरण को बचाने वाला। उल्टा हमसे सब कह रहे हैं कि त्योहार मनाना छोड़ दो। 
     एक होली पर दिल्ली में कितना पानी बचालेंगे हम? महाराष्ट्र में गन्ने की खेती ने जमीन के अंदर का पानी सोख लिया। जब पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक सावधान कर रहे थे, तब सरकार और प्रशासन को नींद आ रही थी। जब दिल्ली में झीलों पर कॉलोनी काट कर बसाई जा रही थी, तब कहां थे सूखी होली खेलने की नसीहत देने वाली सेलिब्रिटी और प्रशासन। हमें पता है जब किसी के मन में आएगा वो राजनीति चमकाने के लिए भीड़ को उकसा देगा, कोई न कोई नहर तोड़ देगा। हमें फिर से 2 रूपए लीटर वाला पानी 25 रूपए लीटर में खरीदना होगा। 
  तो भैया हम तो खेले होली, पानी से भी...और रंग से भी। साल भर पानी बर्बाद नहीं करते, तो त्योहार पर फालतू खर्च भी नहीं करते। उम्मीद है आप भी भीगें होंगे जमकर, गुलाल उड़ाया होगा जीभर कर..। भांग भी कई लोगो ने पी होगी छक्कर...और झूमें होंगे दिनभर। पर हां....
       भांग की आड़ में पड़ोसन को दबोचना नहीं, और न, "जी रंगों में पहचान नहीं पाई आपको", का बहाना बनाकर अपनी पसंद के सलमान खान को पकड़ना। समझे.... 

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