शुक्रवार, अप्रैल 01, 2016

दिमाग में घूमते आवारा शब्द

कल मेट्रो में बैठे बैठे , कुछ लाइनें दिमाग में घूमने लगीं...जाने क्या बात थी, या बिन बात के, यूं ही...कई शब्द लाइन बनाकर दिमाग में आवारागर्दी करने लगे...ये आवारा इतना घूमे कि मजबूरन मुझे इनको बिना देर किए कागज पर उतारना पड़ा.....तो पेश है खिदमत में, आपके, वो आवारा बिन शक्लो सूरत के शब्द....

हर दुखी लगते चेहरे के पीछे 
गमों का सागर ही नहीं होता
कभी कभी खुदा भी मजे के लिए
रोनी सूरतें बना दिया करता है
उसका भी मन होता है दिल्लगी का
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सूरत नहीं सीरत देखो
ये बात तो कब की हवा हो गई
अब अगर शो रूम में माल अच्छा नहीं होता
तो गो डाउन का पता कौन पूछता है
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वक्त अपना ईमानदारी से काटा करो दोस्त
फिर वक्त भी तुम्हें ईमानदारी से काटता है
..............( ये आखिरी वाली लाइन शायद मेरी हालात मुझे ही बताने के लिए दिमाग में आई होंगी...हीहीहीही)

क्या सोचती है दुनिया, इसे हवा में उड़ा दो
दुनिया के आइने अक्सर धुंधले होते हैं
अपनी सूरत अपने ही आइने में देखा करो
क्योंकि इनपर कभी धुल जमा नहीं करती
  ॉे                                            ----------शायर रोहित जी आदतन थोड़ा बंजारा, मिजाज आशिकाना


मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...