सोमवार, मई 16, 2016

ओ पलाश...अमलताश कैसे हो !

      अक्सर ऐसा होता है कि कुछ नाम आपको अनजाने में आकर्षित करते हैं। खासकर वो नाम जो बचपन से सुने हों। जरुरी नहीं कि ये नाम किसी मित्र, रिश्तेदार या दिलरूबा का ही हो। पलाश और अमलताश मेरे लिए ऐसे ही नाम रहे। पेड़ों के नाम हैं ये, पर कैसे, कब और क्यों इन नामों से प्यार हुआ, ये नहीं मालूम। अशोक के पेड़ से वाकफियत तो हनुमान जी की कृपा से हुई थी। पलाश का नाम शायद मेरे दिलो-दिमाग में तब छप गया था, जब दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था, पलाश के फूल। उस सीरियल का टाइटल सॉंग था ''जब-जब मेरे घर आना तुम, फुल पलाश के ले आना"। अब बताइए जब चढ़ती जवानी में ऐसे गीत सुनने को मिलेंगे, गरीब लड़के से अमीर लड़की मोहब्बत कर लेगी, जैसे फसाने दिखंगे तो पलाश ने तो वार करना ही था। वैसे इसमें बेचारे पलाश का भी क्या दोष? वो तो मुझमें मोहब्बत, पैदाइशी कूट-कूट कर भरी हुई है, जिस कारण जरा सा कोई छेड़ता है, कि वो छलक पड़ती है। तभी तो लड़कपन से काफी पहले से ही, मेरा मिजाज आशिकाना है।  
    पलाश के सिंदूरी फूलों के साथ पीला अमलताश जाने कैसा जादूई समां बांधता है। आपने कभी देखा हो, रूक कर, तो जाने ना। पलाश की याद आने पर जब मैं नेट खंगालने लगा, तो पता लगा कि पलाश तो बरसों से नेट पर खिला हुआ है, हर मूड के साथ। दरअसल आपाधापी भरे जीवन में पलाश समेत मैं सबसे दूर सा हो गया था। फिर जब ब्लॉगिंग की तरफ ध्यान गया, तो पलाश से रिश्ता दोबारा जुटा। ब्लॉगिंग के शुरूआती दौर से ही मैं पाठक के तौर पर उससे जुड़ा था। उसी समय में रीवा स्मृति की पलाश पर लिखी पोस्ट से, पलाश से दोबारा दोस्ती ताजी हो गई।  (https://rewa.wordpress.com
   बेफ्रिकी से घूमना, पलाश के फूलों तले, हरी भरी बगिया में, गुलाब की खुशबू से महके गार्डन में घूमना जाने क्यों  बंद हो गया? अब ये बहूत कम होता है, पर जब भी होता है, कसम से सुकुन के वो पल होते हैं, जिसपर कई चीजें कुर्बान। अक्सर ऐसा होता है कि बिना किसी काम के लंबी सड़कों पर निकल जाना, मुझे अक्सर भाता है। बचपन के दिनों में चौड़ी सड़कों पर पलाश, अमलताश के फूलों से लदे पेड़ों के बीच घूमना। बरगद, पीपल, नीम जैसे पेड़ों तले बिताया समय अबतक दिल में संजो कर रखा हुआ है। बचपन में इन सबको मन ने कहीं संजो कर इतने एहतियात के साथ रखा है, कि जब कहीं बाहर की दुनिया में इनसे भेंट होती है तो लगता नहीं कि कई दिनों के बाद मिलना हुआ है। बातचीत ऐसे शुरू होती है जैसे कभी टूटी ही नहीं थी। इंसानी दुनिय़ा में तो महीनों बाद अगर कोई मिलता है, तो लगता है जैसे बातों का सिरा ही गायब हो गया है। वो सिरा पकड़ते, ढूंढते रह जाते हैं, लेकिन मिलता नहीं। 
    शुक्र है भगवान का कि पलाश, अमलताश, अशोक, गुलाब, चमेली से नाता कभी नहीं टूटता। बरसों बाद भी इनसे मिलिए, ये उसी खुले दिल से आपको अपने आगोश में जकड़ लेते हैं। इस जकड़ में अपनेपन की गरमाहट होती है, न कि भौतिक जगत के ठंडे अजनबीपन की। पलाश एंड कंपनी जब जकड़ती है तो दिल और आत्मा को साथ पकड़ती है, जबकि भौतिक जगत में आप अक्सर आत्मा को दुबका कर शरीर से गले मिलकर रह लेते हैं। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...