शनिवार, जून 18, 2016

ओ इत्मिनान कहां हो तुम...

    आजकल घर में बिना पढ़ी 60 किताबों को ढेर लगा हुआ है। इसी तरह कई जगह घूमने कि लिस्ट लंबी होती जा रही है। मेरे लिए किताबें, लिखना और घूमना सबसे बड़ी खुशी है। (चौथी ख़ुशी नसीब ही नहीं हुई..हीही 😊😊) ऐसा नहीं है कि इसके लिए समय नहीं मिल रहा हो। दरअसल पढ़ना, लिखना और घूमना तीनों मैं पूरे इत्मिनान से मजे लेकर करता हूं। जब ऐसा नहीं होता, तब ये काम करते वक्त मजा नहीं आता। (डिस्क्लेमर-मजे का मतलब समान्य मजा ही पढ़ा
और समझा जाए) 
अब जब घर में किताबों का ढेर लग गया है, तो इत्मीनान कहां से लाया जाए? दैंनादिनी इतने उलझाने वाले काम गले में लिपटे हुए हैं कि पूछिए मत। ( कमाल है कि दैंनादिनी जैसा शब्द अचानक कि-बोर्ड से निकल आया, जबकि आजकल उलझनों की वजह से मैं कई लोगो के नाम ही भूल जाता हूं) जब किताबों के पढ़ने में मजे की बात याद आई, तो चेतन भगत की किताब हॉफ गर्लफ्रैंड का ट्रैलर भी याद आ गया। क्यों याद आया वो ट्रेलर, ये मत पूछना। दिमाग तो वैसे भी जाने कैसी-कैसी बातें याद रखता है। फिर कभी सही समय पर, कभी असमय उन चीजों की याद दिलाकर दिलग्गी करने लगता है। 
    दिमाग जितना मर्जी उछलकूद करे, जीत अक्सर दिल की होती है। दिल और दिमाग में जब शांति हो तो समझो, कि आपको दोनों मिलकर आपको घनचक्कर बनाने का प्लान बना रहे हैं। अब दोनो पर काबू कैसे किया जाए, ये दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है। इसके कई जवाब हो सकते हैं। उनमें सर्वमान्य जवाब और तरीका तो ये है कि जो दोनो को अच्छा लगे वो करिए। फिर दोनो बड़े शांत रहते हैं। (डिस्क्लेमर-दिल और दिमाग को अच्छा लगे का मतलब अच्छा ही समझा जाए, कोई उटपटांग ख्याल न लाया जाए। फिर भी ख्याल आ ही गया तो भी आप दिल-दिमाग का का क्या उखाड़ लोगे?
     मतलब ये कि इत्मिनान से शौक को पूरा करने का मजा ही अलग है। किताबों के पन्ने खोलिए और डूब जाइए उसमें। वैसे कहते हैं कि किसी को अपना अक्श खुद हो तो बेहतर है कि वो किताबों की दुनिया में खो जाए। किताबें उसे बता देंगी की उसके दिल में कितनों के लिए जगह है, और कितनों के लिए नहीं। (अब इस कितनों में कोई महबूब का नाम मत लेना) किताब के विषय अर्थात सबजेक्ट की बात यहां नहीं करूंगा। मेरे लिए ये ही बात घूमने पर लागू होती है। जरूरी नहीं कि घूमने के लिए पहाड़ जाऊं, रेगिस्तान में भटकूं या गोवा के समुद्र तट से टकराती लहरों, या तट पर खुले आसमां के नीचे लेटे हुस्न के दर्शन करूं। मैं अपनी घूमक्कड़ी को आवारगी कहता हूं। वो आवरगी राज कपूर वाली है या नहीं, ये नहीं कह सकता। खैर फिलहाल, किंतु-परंतु तो हाल ये है कि दिल्ली में ही आवारगी नहीं हो पा रही, पढ़ाई नहीं हो पा रही, लिखाई नहीं हो पा रही और...वो तो नसीब ही नहीं हुआ।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...