शनिवार, जुलाई 09, 2016

राष्ट्रकवि दिनकर और हम-तुम कवि

हिंदी का असली ज्ञान लेना है तो कालजयी कवियों को पढ़ें। वो तो निराला थे, जिन्होंने कविता को व्याकरण के कड़े नियमों से आज़ाद कर दिया। उसके बाद भी शब्दों को ऐसे जोड़ा कि कविता व्याकरण मुक्त होकर भी बलखाती नदियों की तरह बहती रही। निराला के बाद कई बड़े कवि हुए, जिन्होंने छंद मुक्त कविताओं का स्तर बनाए रखा, मगर इसके साथ-साथ अनेक नौसखिए भी मैदान में कूद पड़े। चार-पांच लाइनें लिखकर कवि होने का भ्रम पालने लगे। ऐसे कवियों की अंतहीन लाइन लग गई। इतना ही नहीं, लिखने के बाद कविता की किताब भी छपवा ली। यानि आत्ममुग्धता के दो पल के चक्कर में जाने क्या-क्या कर बैठे। ऐसे आत्ममुग्धता के मारे ज्यादातर कवि श्रृंगार रस पर ही उल्टी-पुल्टी लाइन लिखकर कवि समझ लेते हैं अपने को। जबकि कवि वो होता है जो किसी भी विषय पर लिख सकता है, वो भी ऐसा कि दिल को छू जाए। विश्वास न हो तो वीर रस के कवि माने जाने वाले राष्ट्रकवि दिनकर की कविता 'बालिका वधु' की लाइनें पढ़िए,
माथे में सेंदूर पर छोटी
दो बिंदी चमचम-सी, 
पपनी पर आँसू की बूँदें 
मोती-सी, शबनम-सी। 
लदी हुई कलियों में मादक
टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली,
गुमसुम खड़ी शरम-सी।
..बताइए इन लाइनों में साक्षात बालिका वधु आपके सामने खड़ी नहीं दिखती....जरा और पढ़िए.... 
पीला चीर, कोर में जिसके 
चकमक गोटा-जाली, 
चली पिया के गांव उमर के 
सोलह फूलों वाली। 
....ऐसे ही राष्ट्रकवि नहीं कहलाए जाते दिनकर। बताइए शब्दों में ऐसा चित्र क्या कोई आज खींच सकता है? जब बात अंदर के संघर्ष को आवाज देने की बात आती है तो दिनकर शब्दों में आग उगलते हैं....हार न मानने की छटपटाहट को अमिट शब्दों में पिरो दिया है उन्होंने........ 
आँखों को है शौक़ प्रलय का, कैसे उसे बुलाऊँ मैं?
घेर रहे सन्तरी, बताओ अब कैसे चिल्लाऊँ मैं?
फिर-फिर कसता हूँ कड़ियाँ, फिर-फिर होती कसमस जारी;
फिर-फिर राख डालता हूँ, फिर-फिर हँसती है चिनगारी।
टूट नहीं सकता ज्वाला से, जलतों का अनुराग सखे!
पिला-पिला कर ख़ून हृदय का पाल रहा हूँ आग सखे!
इस कविता को वेबसाइट कविता कोश से लिया है मैने। हो सके तो उसे जरूर पढ़िएगा। (http://kavitakosh.org)। हिंदी की विंडबना रही कि बच्चन को छोड़कर अधिकतर हिंदी के सेवकों से माता लक्ष्मी या तो रूठी रहीं या फिर आंख-मिचौली खेलती रहीं।  चाहे उपन्य़ास सम्राट प्रेमचंद रहें हो, नई कविता के जनक निराला या फिर दिनकर। हरिवंश राय  बच्चन भी नौकरी के कारण शायद माता लक्ष्मी की कृपा पाने में सफल रहे थे। जहां तक कविवर रामधारी सिंह 'दिनकर' की बात है तो वो बिहार की सबल जाति भूमिहार में पैदा हुए थे। बावजूद इसके उन्होंने काफी पीढ़ा झेली। संयुक्त परिवार के कारण 7-8 बेटियों की शादी ने कवि को बांध सा दिया था। गाहे-बेगाहे ये बात महाकवि के मुंह से भी निकल जाती थी। दो बातों का जिक्र करता हं, जिससे आपको राष्ट्रकवि की परेशानी समझ आ जाएगी। तब आप जान सकेंगे कि आपकी राष्ट्रभाषा के लिए इन लोगो ने कितने कष्ट के बीच भी काम किया। 
     एक बार किसी ने दिनकर जी से पूछा कि वो किस रचना को सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। इसपर उन्होंने कहा कि भूमिहार समाज में जनम लेकर 7-8 बेटियों की शादी को मैं अपनी रचनाओं से ज्यादा बड़ा काम मानता हूं। ऐसे ही किसी ने कहा कि भगवान जानते थे कि ये कवि काफी उड़ता है, इसलिए उसने दिनकर पर कुछ पेपरवेट रख दिये। इसपर उन्होंने हंस कर कहा, एक-दो रखते तो कोई बात नहीं थी, पर उसने तो पूरे 8 ( 7 या 8 ठीक से मुझे याद नहीं) पेपरवेट रख दिए। 
   शायद हिंदी की नींव को सींचने के लिए जिस खून-पसीने की जरूरत थी, वो इन कवियों को बहाना था। इसलिए जब हिंदी का मुकाम बनने का दौर था, नियती ने ऐसे-ऐसे कर्मठ वीरों को हिंदी की सेवा के लिए चुना, जिनकी आज छाया भी कम दिखती है। इन्हीं हिंदी के कर्मवीरों की तपस्या का फल है कि आज 21वीं सदी में तमाम मुश्किलों के बाद भी हिंदी अपनी क्षमता के साथ कायम है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...