दद्दा ध्यानचंद हम तो बेशर्म हैं !!

   
29 अगस्त को दद्दा ध्यानचंद का जन्मदिन था। सुनने में आया है कि खेल मंत्रालय भारत रत्न के लिए दद्दा के नाम की सिफारिश करेगा। इस खबर को सुनकर एक कहावत याद आ गई ‘देर आयद, दुरूस्त आयद’, लेकिन इस फैसले पर ये कहावत चरितार्थ नहीं होती। उल्टा इस मसले पर, जिसपर सालों से सिर्फ चर्चा और शिद्दत से हर साल खोखले वादे हो रहे हों, उसपर खुद को लागू होते देखकर ये कहावत भी शर्म के मारे डूब मरेगी। 
   एक ऐसा खिलाड़ी जिसने गुलाम भारत को गर्व से सीना चौड़ा करने के कई लम्हे दिए। ऐसा खिलाड़ी जिसने गुलाम भारत के नाम को दुनिया में एक पहचान दी। ऐसा शख्स जिसने बड़ी सहजता से दुनिया के क्रूरतम तानशाहों में एक हिटलर के ऑफर को ठुकरा दिया। उसी के सामने जर्मन टीम को हॉकी के मैदान में चारो खाने चित्त कर दिया हो, उस शख्स को देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान देने के लिए सियासत सालों से गंभीर चर्चा (यानी नाटक) कर रही है!! 
    दद्दा ध्यानचंद ने अपने जीवन मे ही हॉकी की दुर्दशा देख ली थी। गुलामी के दौर में जिस टीम को उन्होंने 3 ओलंपिक गोल्ड दिलाए थे, उसे आज़ाद भारत में हांफते हुए देखा था। सियासत को उसी हॉकी को चौपट करते देखा था। हद तो ये रही कि खुद को ही हाशिए पर धकेला जाते भी देखा। जब उन्होंने दिल्ली के एम्स के जनरल वार्ड में आखिरी सांस ली थी, तब डॉक्टर ने कहा था कि भारतीय हॉकी खत्म हो गई। कितना सही था उन डॉक्टर का कहना। उस दिन दद्दा ने नहीं भारतीय हॉकी के सुनहरे दौर ने अंतिम सांस ली थी। जिसका पुनर्जन्म शायद ही हो पाए। 
   हमारी हॉकी की हालत ग्वालियर में बना रूपसिंह स्टेडियम बाखूबी बयान करता है। रूपसिंह यानि दद्दा ध्यानचंद के छोटे भाई और साथी खिलाड़ी। जिन्होंने उनके साथ ओलंपिक समेत कई मैच खेले। उनके खेल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि बर्लिन में एक सड़क उनके नाम पर है। हमारे यहाँ उन रूपसिंह के नाम से बने स्टेडियम में 1988 के बाद से हॉकी नहीं, बल्कि किक्रेट खेली जाती है। खैर छोड़िए क्या-क्या और किस-किस बात पर चर्चा  करें? 
सम्मान से होगा सम्मान
   यहां एक सवाल उठता है, कि अब अगर दद्दा को भारत रत्न दे भी दिया गया तो क्या फायदा? क्या इतने साल बाद अब भी इस पर चर्चा करना स्वर्गीय दद्दा के साथ एक भद्दा मजाक नहीं है? उनके जाने के 47 साल बाद इससे आपको, हमें या उनके प्रिय खेल हॉकी को कोई फायदा होगा? जो देश और समाज अपने आदर्श और निर्माताओं में से एक को जिंदा रहते हाशिए पर धकेल दे, उस समाज का सम्मान क्या कोई मायने रखता है? वो भी इक्कसवीं सदी में? अब तो सम्मान दिया भी गया तो, वो सिर्फ शर्मिंदगी से बचने के लिए देंगे। 
बेहतर होता
    क्या ये बेहतर नहीं होता कि ओलंपिक में टीम इंडिया कोई पदक ही ले आती? क्या बेहतर नहीं होता कि हॉकी में घुसी राजनीति और क्षेत्रवाद का खात्मा किया जाता? क्या बेहतर नहीं होता कि सबसे बडे नागरिक सम्मान में खेल को शामिल करते ही सबसे पहले दद्दा को इससे सम्मानित किया जाता?
   निसंदेह सचिन तेंदुलकर किक्रेट के महानतम खिलाड़ियों में हैं। भले ही सचिन के रिटायरमेंट के बाद मेरे जैसे कई लोगो ने क्रिकेट देखना लगभग छोड़ दिया हो। भले ही उनकी लोकप्रियता के कारण सरकार को नियम बदलने पड़े। इस सबके बावजूद भारतीय खेल जगत में भारत रत्न के सबसे बड़े और पहले हकदार दद्दा ही थे। असल में सचिन महानतम खिलाड़ी तो हैं, मगर खेल का पर्याय नहीं बन पाए हैं। समझ रहे हैं न कि मैं क्या कह रहा हूं?  
ध्यान सिंह से ध्यानचंद
    चलिए इन सवालों के बीच से बेशर्म नेता बनकर बच निकलते हैं। मैं आपसे विकिपिडिया से मिली एक जानकारी साझा करता हूँ की ध्यान सिंह जादूगर ध्यान चंद कैसे बने थे। जब दद्दा सेना में थे, तो दिन की ड्यूटी के बाद रात में हॉकी का अभ्यास करते थे। अभ्यास के लिए दद्दा रात में चांद का इंतजार करते थे। फिर चांद की रोशनी में खेल का अभ्यास करते थे। बस इस कारण उनके साथी उन्हें चांद के नाम से बुलाने लगे। इसतरह दद्दा ध्यान सिंह से ध्यानचंद बन गए। इससे एक बात सीखने को मिली कि चांद की रोशनी में सिर्फ आशिकी के तराने ही नहीं गाए जाते। बल्कि चांद की रोशनी में हॉकी का जादूगर भी  बना जा सकता है। यानि अपने दद्दा की तरह अपने फन को निखारा भी जा सकता है। वैसे अभी मुझे इसबात की जानकारी नहीं कि वियना की चार हाथों वाली दद्दा की मूर्ती की तरह भी ये बात दद्दा से जुड़ी अनेक किवदंतियों में से एक तो नहीं है। 
    चलते-चलते एक बात और बता दूं कि दद्दा को एक मलाल भी था। वो ये कि अपने खेल जीवन के दौरान वो इंग्लैंड को हरा नहीं सके। क्योंकि उनके जीवन में इंग्लैंड कभी भारत के खिलाफ कोई हॉकी मैच खेला ही नहीं। भारत के गुलाम बनाने वाले को हरा न पाने का दद्दा को मलाल था, मगर हमारे सियासत को, समाज को कबी कोई मलाल नहीं होता।
   खैर छोड़िये, यह सवाल बेकार में उछलकूद मचाते हैं। ये भी आज नहीं तो कल, मेरी तरह कहीं कोने में पड़े-पड़े कभी न कभी दम तोड़ ही देगें।

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