बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

यूपी-ये तो होना ही था...

    
लगता है कि आखिरकार पप्पा ने बेटे को सीख के साथ सियासत सौंप दी है। कुछ मनमुटाव और नाराजगी के साथ बेटे की ख़ता माफ कर दी। तमाशा तब शुरू हुआ था जब चचा पप्पा बनने के चक्कर में भतीजे से भिड़ गए। जनता के बीच संदेश गया कि देर-सबरे परिवार बंटने वाला है। जब घर में बर्तन-भांडे बजने लगें, तो घर का मुखिया समझ जाता है कि जीते-जी विरासत बांट दो।। वरना जो छीछालेदारी होगी, वो सिर्फ इज्जत पर बट्टा ही लगाएगी। वैसे ये घर-घर की कहानी है, विरासत के बंटवारे की कहानी है। फिलहाल तो लग रहा है कि स्वाभाविक तौर पर बेटा जी जीते गए हैं। आखिर गर्म खून है, जनता को जवाब देना है उसने चुनाव में। जनता के सामने बेटा जी भ्रष्टाचार, अपराधियों को संरक्षण देने आदि-आदि धब्बे के साथ नहीं जाना चाहते।    
कब-कब, क्या-क्या हुआ
   ये हल्ला-गुल्ला पिछले दिनों शुरू हुआ था बदनाम लोगो को परिवार से जोड़ने के बाद। चचा ने भतीजे से बिना पूछे बदनाम लोगो को घर से घुसा लिया। खबर मिलते ही जवान खून ने बगावत कर दी। कई घंटो की उठापठक के बाद बगावत को दबाने के लिए पिताजी ने बदनाम घर से रिश्ता तोड़ दिया। तब पिता ने किसी तरह जवान घोड़े की लगाम कस दी। बेटे जी के सर्मथकों को हड़का दिया कि पार्टी इन छोरों ने नहीं बनाई। पार्टी भाई के साथ मिलकर पहलवान पिता कि मेहनत का नतीजा है। बगावत दब सी गई, लेकिन चिंगारी सुलग रही थी। लग रहा था कि देर-सबेर ये गुल खिलाएगी। लग रहा था कि अगली पीढ़ी जनता को ये संदेश देना चाहती है कि पार्टी के अंदर 'बदनाम होंगे तो नाम नहीं होगा' वाली कहावत को वो चरितार्थ नहीं होने देंगे।   
जिल्ले इलाही के खिलाफ शहजादा ?
  जल्दी ही बगावत ने सिर उठाया।। लोगो को लगा कि जिल्ले इलाही के खिलाफ शहजादे ने बिगुल फूंक दिया है। सुबह से दोपहर हो गई, दोपहर से शाम हो गई, जंग अब छिड़ी की तब छिड़ी वाले हालात हो गए। सर्मथक सैनिक कई जगह गुत्मगुथ्ता हो गए,। शाम होते-होते बेटा जी ने खम ठोक कर कह दिया कि वो ही विरासत के उत्तराधिकारी हैं, और कोई नहीं। पहलवान पिता तरह-तरह से डांट लगाते, घर से निकाल देने की धमकी देते, कान खींचते, वगैरह वगैरह करते देखे गए। आखिर एक तरफ हर हाल में साथ रहने वाला भाई था, एक तरफ बेटा। बेटा जी को दूसरे चचा का खुला साथ मिला हुआ था। आखिर में वो ही हुआ, जो हर घर में होता है। पहलवान हुए तो क्या हुआ, आखिर पिता ही हैं। बेटा जी कि जीत हो गई। पहलवान पिताजी ने घर की बात घर में रखने की कड़ी नसीहत देकर जनता में ऐलान कर दिया कि सुलह हो गई है। बावजूद इसके बातें, कानाफूसी इस कान से उस कान जारी हैं। 
इस्तीफा देते तो...
    बेटा जी अगर इस्तीफा दे देते और पार्टी अगले चुनाम में हार भी जाती, तो भी उनका राजनीतिक कद काफी बड़ा हो जाता। बेटा जी कि पितृभक्ति देख जनता की नज़र में बेटा जी छवि और चमक जाती। उल्टा पिताजी के कई करोड़ बड़े-बुजुर्ग वोटर अगले चुनाव में बेटे जी के साथ खड़े हो जाते। जी हां पिताजी के करोड़ों वोटर, क्योंकि पिताजी का जमाना अभी बीते जमाने की बात नहीं हुई है। अब भी पिताजी अखाड़े में दांव भरने का दम भरते हैं। ऐसे में बेटा जी गद्दी से चंद दिन का विछोह सहने का निर्णय भी करते तो घाटा नहीं होता। वैसे ये जरूरी नहीं की राजनीति में जो सोचा जाए वो हो ही जाए, क्योंकि यहां ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, पता नहीं चलता। राजनीतिक कहती है कि जो हाथ में हो उसे छोड़ों मत, क्योंकि कोई और सत्ता पर बैठ गया, तो वो उससे चिपकेगा नहीं, इसकी कोई गारंटी भी नहीं।  
नूरा कुश्ती थी !    
   कहने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि ये सब नूरा कुश्ती थी। सारा खेल बेटा जी कि छवि को चमकाने के लिए खेला गया था। जिमसें कामयाबी मिल गई है। विधायकों की फौज का बहूमत बेटा जी के पक्ष में खड़ा हो गया। पता चल गया कि विधानसभा में बहुमत पर कोई संकट नहीं है। यानि सीधे-सीधे बिना लाग-लपेट विरासत बेटे जी को सौंपने का बहाना मिल गया है। अगर ये सच मान लिया जाए कि ये नूरा कुश्ती थी, तो पहलाव पिताजी के दांव की दाद देनी पड़ेगी। ऐसे ही नहीं कहा गया है कि बाप आखिर बाप होता है। 
कहत ेहैं कि ...
  वैसे घर के अंदर की कहानी भी चर्चा में है। अब अपुन बिल्ली तो हैं नहीं, जो घर के अंदर जाकर वहां की कहानी सुनाएं। वैसे सबको पता ही है कि दांव-पेंच में रानियां भी कम घात-प्रतिघात नहीं करतीं। तो इसमें आश्चर्य कैसा? फिलहाल तो अंदर-बाहर का हाल देखते रहिए और कीजिए विरासत की जंग के आखिर अध्याय का इंतजार। 

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   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...