रविवार, जनवरी 01, 2017

2016 जी, अलविदा

    
जिंदगी का एक साल और विदा हो गया। हमने 2016 को अलविदा कह दिया। 2017 ढाई घंटे का हो गया। घंटे, मिनट उसके आगे सेकेंड में समय बीतता चला जा रहा है। घड़ी की सूइंया एक तरफ बीतते पल का अहसास करा रही हैं, तो एक तरफ आगे का रास्ता तय करने की तैयारी को कह रहा है। जो रास्ता गुजर गया, वो वापस नहीं आना। गाना याद आ रहा है, "जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकां, वो फिर नहीं आते"। कई सपने अपने साथ लेकर 2016 साल चला गया, तो कुछ सपने 2017 को सौंप गया है। कुछ उसी तरह जैसे 20 साल पहले हमारे एक पीएम को पिछले पीएम एक सपना दे गए थे, और कह गए थे इसे पूरा करना। तैयारी हमने मुकमल कर दी है। बस आप इसे साकार कर लेना।  
    जिनके सपने पूरे हुए, उनमें कई लोग झूमते हुए, गाते हुए, ठंड के बीच ही 2017 में गए। हाथ में जाम लिए, मुस्कुराते हुए। जिनके सपने रह गए, उनमें से कोई उनका बोझ लादे पस्त है, तो कई लोग नए सपने सजाने की तैयारी के साथ 2017 को हैलो कहने में लग गए। 2017 की पहली सुबह संडे के साथ होगी। दुनिया की रिवायत के अनुसार छुट्टी होगी। पहला दिन जैसे कह रहा हो कि कर लो जी भरकर आराम, आगे साल भर तो काम करना ही है। यही तो जीवन है, चलते रहने का नाम। 
  टीवी पर फिल्म 'मिली' आ रही है। अमिताभ और जया भादुड़ी के सहज, सशक्त अभिनय से सजी हुई। अमिताभ फिल्म में अपनी मां की चिठ्टी पढ़ रहे हैं, आखो में आंसू है। उनको निराशा के गहरे कुएं से निकालने के लिए अब कंधा थामे मिली(जया) खड़ी हैं। प्रतीकों में कहानी कितना कुछ कह देती है। जब कोई एक कमजोर पड़ता है, तो दूसरा उसके साथ मजबूती से खड़ा हो जाता है। जब दूसरा कमजोर पड़ता है, तो पहला उसका कंधा थाम लेता है। वक्त के हिसाब से रोल बदल जाते हैं।
    तो 2016 अलविदा कह चुका है। अब उसको उसकी खट्टी-मिठ्ठी यादों के साथ विदा कर देने का वक्त है। टीवी पर चलती फिल्म भी कह रही है कि आगे बढ़ो। अमिताभ का किरदार शेखर सेठ साहब का लड़का के रूप में निराश के गर्त में रहता है। उसे 'मिली' खींचकर जीवन में लाती है। इस वक्त चलती फिल्म में मिली बीमार है। उसके आसपास शेखर के भेजे गुलदस्ते हैं। पुराने गुलदस्तों को 'मिली' की बुआ बाहर करना चाहती है, पर वो उन्हें रोक देती है। किरदार बदल रहा है, निराशा की गुफा में गिरती 'मिली' दिखती है। जहां से किरदार अपना रोल बदल लेते हैं। इसी तरह 2016 चला गया 2017 के कानों में कई बातें फुसफुसा कर। 
      अब यादों के साये में खुद घुसकर डूबे रहने का कोई फायदा है? नहीं न। तो क्यों न नए साल के साथ चल पड़ते हैं। पुराने सायों को उनकी गुफा में छोड़ देते हैं। उस गुफा में काले सायों की जगह उजले साये क्यों न भर दें। जिंदगी में जब कभी सुस्ताने का मन हो, इसी उजली यादों की गुफा में चले आएं।
   2016 हमारे सपनों की जो पोटली 2017 को दे गया है, वो उसे रोज लिए चलता है। हम जब चाहें उस पोटली में झांक कर, अपना सबसे अच्छा सपना, क्यों न पुरा करने की कोशिश करें। हमारी खुशी में 2017 भी बहुत खुश होगा। वो खुश होगा कि 2016 के सपने उसने वक्त में पूरे हुए हैं। आखिर  बीस साल पहले को दोहराते हुए 2016 ने 2017 के कानों में कह दिया है कि हमने तैयारी मुक्मल की हुई है, बस आपको बस इसे साकार करना है।  
    अब 'मिली' जैसी फिल्में नहीं बनती, समाज भी वैसा नहीं। अब वन नाइट स्टैंड का जमाना है। लिवइन का चलन है। बावजूद इसके सपने बदले नहीं हैं। खासकर आगे बढ़ने के सपने। बस इंतजार और धैर्य कहीं खो से गए हैं। समय के साथ चीजें बदलती हैं, तो कुछ तरीके भी बदल गए हैं। अगर कुछ नहीं बदला है तो जुनून। तो चलिए 2017 को खुश होने का मौका देते हैं। आखिर बीस साल पहले भी तो यही हुआ था। बुद्ध दोबारा मुस्कुराए थे।