बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

ये 'लुगदी साहित्य' वाले !

62 की उम्र जाने की नही होती, फिर भी वेद प्रकाश शर्मा  ने अलविदा कह दिया। वही वेद प्रकाश शर्मा जिनको गुजरे जमाने के ‘लुगदी साहित्य’ का सफलतम उपन्यासकार माना जाता था। दस-पंद्रह साल पहले तक साधारण और सस्ते कागज पर छपने के कारण जासूसी उपन्यासों को 'लुगदी साहित्य' कहा जाता था। इस 'लुगदी' कागजों पर सेक्सी किताबें, फिल्मी गाने, शायरी भी छपती थी। लुगदी साहित्य में गिने जाने वाले उपन्यासों का कवर मोटे कागज का होता था, और उपन्यास का नाम उभरे हुए शब्दों में चांदी के रंग या सुनहरे अक्षरों में होता था। 
     भारतेंदू युग के साथ ही शुरू होने के बाद भी जासूसी उपन्यासों को दोयम दर्जे में रखा गया। उसी दौर से जासूसी उपन्यास ज्यादातर लोकप्रिय साहित्य की श्रेणी में रखा गया। आज भी भारत में जासूसी उपन्यासकार अपने विदेशी उपन्यासकारों की तुलना कुछ भी नहीं है। हाल तक तो ये हालत थी कि प्रचार के नाम पर सिर्फ जासूसी उपन्यासों के पीछे उपन्यासकारों की तस्वीर छाप कर इतिश्री कर ली जाती थी। हकीकत ये है कि हिंदी के कई जासूसी उपन्यासकार बेहद साधारण जिंदगी ही जी पाए। कई उपन्यासकारों के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ होना ही बड़ी बात रही। जबकि उनके समकक्ष विदेशी उपन्यासकारों किसी स्टार से कम नहीं रहे। सफल यूरोपिय और अमेरिकन जासूसी उपन्यासकारों अपने-अपने देशों में किसी स्टार से कम नहीं हैं।  
     देश भर के रेलवे स्टेशन से लेकर, फुटपाथी दुकानों, बुक डिपो में 'लुगदी साहित्य' आसानी से मिल जाते थे। वेद प्रकाश शर्मा इसी ‘लुगदी साहित्य’ के लाख से ऊपर बिकने वाले उपन्यासों के पहले लेखकों में रहे हैं। हिंदी साहित्य की जमीन पर ये कड़वी हकीकत नहीं बदली है कि किसी किताब की एक प्रति का लाख से ज्यादा बिकना आज भी दिवास्वप्न सरीखा ही है। वेद प्रकाश शर्मा पहले घोषित, या स्वघोषित लेखक रहे, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी किताबें एक लाख से ज्यादा बिंकी हैं। इससे पहले हिंदी जगत में सिर्फ धर्मवीर भारती का उपन्यास 'गुनाहों का देवता' ही एक लाख से ज्यादा बिका था। हालांकि धर्मवीर भारती उपन्यासकार न होकर खालिस पत्रकार थे। अब ये संयोग ही रहा कि उन्होंने एक ही उपन्यास लिखा और वो भी लाख से ऊपर बिक गया। 
    'लुगदी साहित्य' की सर्वत्र उपलब्धता के कारण कई जासूसी उपन्यास लाखों में जरूर बिके होंगे। प्रकाशक भले इसे न मानते हों, पर देश के कई हिस्सों में घूमने के कारण, एक पाठक के तौर पर प्रकाशकों की बात पर विश्वास करना मेरे लिए असंभव है। (क्रमश:)

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