'ये लुगदी साहित्य वाले' - 2


   ये सच है कि आज भी जासूसी किताबों की गिनती हिंदी साहित्य में नहीं होती। हिंदी जगत जासूसी को विधा ही मानने से इनकार करता रहा। इसकी कसक जासूसी उपन्यासकारों को हमेशा रही। समय-समय पर वो अपने उपन्यासों के लेखकीय में अपनी आवाज भी उठाते रहे। बावजूद इसके की जासूसी उपन्यासों की बिक्री लाख के आंकड़े को कई बार पार कर चुकी है। वो लाख का आंकड़ा, जिसका सपने देखते-देखते कई दिग्गज साहित्यकार फानी दुनिया से रूखसत हो गए। जिसका सपना आज भी हिंदी के बड़े कहलाने वाले लेखक देखते हैं। 
    दरअसल हिंदी की दुनिया में साहित्य का जो पैमाना अपनाया गया, उसपर 'लुगदी साहित्य' कभी खरा नहीं उतर पाया। 'लुगदी साहित्य' की जिद्द रही कि उसे साहित्य का दर्जा हासिल हो। 'लुगदी साहित्य' वाले बड़े लेखकों में शुमार स्वर्गीय वेद प्रकाश जी, शानू इस मुहिम में लगे रहे। इससे इतर जासूसी उपन्यासों के बड़े नाम सुरेंद्र मोहन पाठक कई दिनों तक इस मुहिम में शामिल नहीं थे। उनका कमोबेश ये मानना रहा था कि साहित्य समाज को दिशा दिखाता है, समाज के भावों को, समस्याओं को हल करने का रास्ता सुझाता है। जबकि उनके जैसे लेखक सिर्फ लोगों का मंनोरंजन ही करते हैं| उनका लिखा लोग टाइम पास के लिए पढ़ते हैं। वो इस बात को भी बिना किसी हिचक के मानते रहे कि भले हिंदीभाषी करोड़ो की तादाद में हों, फिर भी वो लाख तक बिकने वालों उपन्यसाकार नहीं थे। 
   हालांकि हर स्टॉल पर नजर आने वाले पाठक साहब लाख से ज्यादा नहीं बिकते होंगे,  इसपर मुझे कभी विश्वास नहीं हुआ। मेरे हिसाब से गुलशन नंदा के बाद रिप्रिंट हो होकर पाठक साहब के उपन्यासों ने लाख के आंकड़े को कईबार क्रॉस किया होगा। फिर भी उन्होने कभी अपने को साहित्यकार नहीं माना। बाद के दिनों में उनका ये स्टैंड कब और क्य़ों बदला, इसका पता मुझे नहीं चल पाया। जासूसी उपन्यासों के आज के रूपरंग में आने से पहले, सिर्फ वेद प्रकाश शर्मा का नाम ही लाख से ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार के तौर पर लिया जाता था| उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी।
    जाहिर है जब जासूसी किताबें हिंदी के साहित्यकारों की किताबों की तादाद से कहीं ज्यादा बिक रही हों। लुगदी साहित्य कही जानी वाली किताबों पर भी फिल्में बन रही हों, तो ये तो सवाल इन उपन्यासकारों को सालता था कि आखिर 'लुगदी साहित्य' कहकर उनके काम को खारिज क्यों किया जाता है। (क्रमशः)

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