रविवार, अप्रैल 02, 2017

लुगदी साहित्य के बहाने-3


हिंदी साहित्य ने कभी भी जासूसी उपन्यासों को जीवन का हिस्सा नहीं माना। संस्कृत साहित्य में जासूसी उपन्यासों का जिक्र नहीं के बराबर मिलता है। जिन किताबों में दांवपेंचों का जिक्र रहा, उनमें भी बड़े राजाओं की जिंदगी, कर्तव्य, समाज के आदर्श और नीति शास्त्रों की प्रधानता रही। दुनिया में राजाओं की लड़ाई पर सबसे बड़ा महाकाव्य भारत में रचा गया है। वो केवल लड़ाई के दांवपेंचों पर ही बात नहीं करता, उसमें जीवन को जीने, कर्तव्यों को समेटा गया। इन सबसे बड़कर महाकाव्य में संजय की आंखों के सहारे और अर्जुन के सवालों के माध्यम से जिंदगी की झण भंगुरता का दर्शन दुनिया को दिया गया। यानि अध्यात्म हर जगह मौजूद रहा।
हिंदी साहित्य संस्क़त की मजबूत नींव पर खड़ा हआ है। संस्क़त दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा है। संस्कृत साहित्य में ब्रह्मांड से भी परे का जिक्र है। जाहिर है ऐसी सम़द्ध भाषा की संतान होने के कारण आधुनिक हिंदी के साहित्य के पैमाने काफी सख्त हैं। जिस कारण उस पर खरा उतरना हर किसी के बस की बात नहीं रहती। इसलिए हिंदी साहित्य की विवेचना करते समय हमें सूदूर इतिहास में भी झांकना पड़ता है।
फिलहाल हम बात जासूसी उपन्यासों की कर रहे हैं। खड़ी बोली के पहले कवि का श्रैय अमीर खुसर खुसरो को है, पर आधुनिक हिंदी या कहें कि खड़ी हिंदी की शुरूआत भारतेंदु हरिश्चंद से शुरू होती है। भारत गुलाम था, इसलिए ज्यादातर साहित्य में कहानी, कविता के जरिए भारतीयों में बहादूरी जगाने, भारत के वैभवशाली इतिहास से जनता को परिचित और जगाने की कोशिश होती रही। जनता को जाग़त करने के लिए लिखे गए लेखन ने हिंदी साहित्य के पैमाने तय किए। उसी शुरूआती दौर में ही हिंदी का पहला जासूसी उपन्यास छपा। चंद्रकांता संतति, जिसके लेखक थे देवनंदन खत्री।
     कोई उपन्यास किस तरह पूरे लोगो को प्रभावित करता है, इसका ज्वलंत उदारहण है चंद्रकांता संतति। खड़ी बोली के इस पहले उपन्यास ने पूरी हिंदी पट्टी में तहलका मचा दिया। लोगो ने इसे पढ़ने के लिए खड़ी बोली सीखी। इसका इस किताब का क्रेज इतना था कि बंगाल और दक्षिण भारत में भी कई लोगो ने इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी।
(क्रमश:)

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