शनिवार, अप्रैल 15, 2017

....और रीगल भी इतिहास हो गया

  
आखिर रीगल भी इतिहास हो गया। वही रीगल जो दिल्ली के कनॉट प्लेस में शान से पिछले 85 साल से जमा हुआ था। वही रीगल जिसमें न जाने हम में से कितनों ने अपनी कई शामें गुजारी थी। हम में से कई के माता-पिता या दादा-दादी ने इसमें अपनी गर्ल फ्रैंड या नई नवेली दुल्हन के साथ फिल्म देखी होगी। कई ऐसे भी होंगे जिन्होंने पहली फिल्म अपनी प्रेमिका के साथ देखी होगी, फिर अगली फिल्म नई नवेली दुल्हन को दिखाने लाए होंगे। हम जाने कितनी बार किनारे की सीट पर बैठे बार-बार आते-जाते लोगो के कारण झुंझलाए होगें। हममें से जाने कितनों ने पिछली सीटों पर बैठ कर फिल्म में कम, अपने प्रेमी/प्रेमिका पर ज्यादा ध्यान दिया होगा। हाथों में हाथ, कंधे पर सिर टिकाया होगा। इसी बीच आसपास से सीटी की आवाज सुनकर स्क्रीन पर ध्यान देने का नाटक किया होगा।
हम लोगो के ऐसे अनेक अनमोल पलों के साक्षी रहे रीगल ने अपनी आखिरी शाम अपने प्रशंसकों के नाम कर दी। ये शाम रीगल के प्रशंसकों के लिए अतीत के यादगार लम्हों को आखिरी बार जीने के नाम रही। रीगल के प्रबंधकों ने भी उस आखिरी शाम को रीगल के सबसे बड़े चहेते ग्रेट शो मैन राजकपूर के नाम कर दी। इसतरह राजकपूर की फिल्म संगम के आखिरी शो के साथ रीगल इतिहास के पन्नों में समा गया। रीगल का पड़ोसी रिवोली और उसी की कॉलोनी के ओडियन के सिंगल स्क्रीन थियेटर कब के दम तोड़ चुके थे। अब रीगल की बारी थी। तो उसने भी परदा गिरा दिया...|
    लास्ट डे, लास्ट शो और यादों को फिर से जीने का क्रेज लोगो को खींच कर रीगल ले गया। मगर मैं इस भीड़ में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा सका। इससे पहले भी मैं दो बार ऐसा कर चुका था। अप्पू घर और दक्षिण दिल्ली में बने चाणक्य थियेटर के आखिरी दिन भी मैं दोनो जगह नहीं गया था। पहले मुझे लगता था कि अप्पू घर और चाणक्य थियेटर जाने का समय नहीं निकाल पाया। ...लेकिन रीगल ने अहसास कराया कि अप्पू घर और चाणक्य थियेटर न जाने की वजह समय की कमी नहीं थी। दरअसल इसके पीछे वो अहसास था, जो इन जगहों पर बीते जीवन के खूबसूरत लम्हों को जस का तस अपने जेहन में बसाये रखना चाहता है|
मेरी यादों में ये तीनों हमेशा ऐसे ही दर्ज रहेंगे, जैसे वो आज भी उसी हालत में चल रहे हों। शायद ये उन सुपरस्टारों का करिश्मा ही है, जो अनजाने में मेरा हिस्सा बन गए। जिनका जीने का एक अंदाज होता था....जैसे देवानंद साहब नहीं चाहते थे कि उनके मरने के बाद की तस्वीर उनके फैन देंखें....इस तरह वो फिल्मी दर्शकों की याद में हमेशा के लिए हंसते हुए, स्टाइलिश हीरो के तौर पर बस गए....इसी तरह फिल्म स्टार साधना भी दिखती दर्शकों के दिल में सदा हीरोइन के तौर पर बसी हुई हैं...कारण ये रहा कि उन्होंने हीरोइन के तौर पर ही फिल्म लाइन को अलविदा कह दिया...उन्होंने हीरोइन के अलावा कोई और रोल किया ही नहीं...शायद यही वजह रही कि मैं रीगल थियेटर को अलविदा कहने नहीॉ गया.... भले वो मल्टीप्लेक्स के तौर पर वापस खुल जाएगा... पर मेरी तरह कई लोगो  के दिलों में उसका सिंगल थियेटर वाला अंदाज जिंदा रहेगा... और जिंदा रहेगा कई लोगोॉ के अंदर मखमली हाथों को पकडये रहने का वो खूबसूरत अहसास...
   अब हमारे लिए कनॉट प्लेस की रीगल बिल्डिंग का हिस्सा अब पहले जैसा नहीं रहेगा। जैसे मैं उसके पड़ोसी रिवोली के नए रूप में अबतक नहीं गया, उसी तरह शायद रीगल के मल्टीप्लेक्स में भी न जा पाउं। हालांकि वहां मैंने कभी किसी प्रेमिका(जिनको मैं मानता रहा) के साथ फिल्म नहीं देखी। बावजूद इसके कनॉट प्लेस में मेरी आवारगी शिवाजी स्टेडियम से उतर कर रीगल बिल्डिंग के गलियारों में चहलकदमी से ही शुरू और खत्म होती थी....अब वो अहसास शायद न हो पाए। रीगल के बंद होने के बाद मैं कनॉट नहीं गया हूं। अगले हफ्ते वहां जाना तो होगा...पर अंदर से कुछ रीत जाने का अहसास बराबर रहेगा। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...