बुधवार, मई 31, 2017

आधुनिक भारत में जंगली कानून की वकालत क्यों ?

courtsey-http://parliamentofindia.nic.in
1947 - करोड़ से ऊपर की लाशों के बीच बैठकर गणतंत्र वाला संविधान अपनाया था| सोचा था आधुनिक भारत होगा,  बिस्मिल, लाहिड़ी, अशफाक, आज़ाद और भगतसिंह वाला....चंद्रगुप्त-चाणक्य वाला प्रशासन होगा... गांधी वाला संयम होगा....पर ये अरबी जंगली कानून वाले, हलाला वाले, तालिबान वाले, पाकिस्तान परस्त गद्दार, इस्लाम के नाम पर आंतक मचाने वाले, अंधकार युग के समुद्र पार जाने पर पापी होने ठहराने वाले पोगा पंडित, जन्म से जात बनाने वाले, भगवान की मूर्तियों को तोड़ने वाले, धर्म बदलने की धमकी देने वाले, कार्ल मार्क्स की थ्योरी का बलात्कार करने वाले भर गए हैं देश में। 
   आखिर इन सबका इलाज क्या है? सीधे-सीधे इसका इलाज फिलहाल तो है चाणक्य वाला....कठोर सजा तत्काल। जो भी लोकतंत्र के साथ स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर न समझे, जो जुबान देश के खिलाफ जाए, उसपर लगाम लगाना जरूरी है। अगर पानी सिर से गुजरने लगे, तो बिना देर किए फांसी के तख्ते पर गद्दार देशद्रोहियों को पहुंचाना होगा। याद रखिए मानवाधिकार जैसे सजे हुए शब्द तभी सार्थक होते हैं जब लोकतंत्र जिंदा हो। उस लोकतंत्र की आड़ में जिसकी लगाम बेलगाम हो, उसे हर हाल में काटना होगा।
   आजकल ये फैशन चल पड़ा है कि हाथ के बदले हाथ वाला जंगली कानून बनाने पर जोर दिया जा रहा है। कई लोगों पाषाण काल के कानून को अपने और दूसरों पर थोपने पर जोर दे रहे है। एक धर्म के मामले में दूसरे धर्म के लोगो के बोलने पर उनपर जानलेवा हमला किया जा रहा है। 
     आजाद भारत में सबकी पहचान एक भारतीय के तौर पर रखी गई है। सभी को अपने धर्म का पालन करने की छूट जरूर दी गई है, पर ये छूट व्यक्तिगत है, न कि दूसरों पर थोपने के लिए। मगर आजकल इस अधिकार को ठुकरा कर धर्म के नाम पर दूसरों को व्यक्तिगत जिदंगी में दखल दिया जाने लगा है। 
  आजादी के बाद संविधान बनाते वक्त ये गलती हो गई कि आधुनिक कानून के तहत एक धर्म को लाया गया, पर बाकि को छूट दे दी गई। उम्मीद थी कि आने वाले समय में लोग ज्यादा समझदार होंगे। हमारे संविधान निर्माता करोड़ों की लाशों के बीच बैठकर भी ये न समझ पाए कि आने वाले बरसों तक ऐसा होना मुमकिन नहीं होगा। आरक्षण और शादी खत्म करने के धार्मिक आजादी देना ऐसी ही बड़ी गलती थी। 
   आधुनिक भारत की नींव लोकतंत्र, संमान अधिकार और बिना भेदभाव वाले समाज की परिकल्पना पर डाली गई थी। उसके तहत जनता को ये अधिकार है कि वो सरकार चलाने वाले से लेकर विपक्ष में बैठने वाले सियासदानों से सवाल कर सके। मगर हो रहा इसका उल्टा है। एक तरफ धर्म की आड़ में जंगली कानून लागू कराने की कोशिश हो रही है। तो दूसरी तरफ बोलने की आजादी को भौंकने की आजादी में बदल दिया गया है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...