सोमवार, जून 12, 2017

एक डर से मुक्ति..थैंक्स लक्ष्मी

कई बार समय के साथ किसी से रूबरू होने वाला डर या घबराहट खत्म हो जाती है। आप बरसों उसका सामना करने से कतराने रहते हैं। फिर जब अचानक आप उस शै को अपने सामने पाते हैं, तो आप अपने को सहज ही पाते हैं। पता नहीं कब वो डर और घबराहट उड़न छू हो चुकी होती है। लक्ष्मी से मिलना ऐसा ही रहा। मई (28 मई)  की आखिरी शाम कनॉट प्लेस में हिंदी कवियों का एक गेट-टूगेदर था। मैं वहां बिन बुलाए जा टपका था। जिस वक्त मैं वहां पहुंचा उस वक्त लक्ष्मी उन लम्हों को साझा कर रही थी, जब उसने अपने दर्द को शब्द देने की कोशिशें शुरू की थीं।
ये हैं लक्ष्मी...योद्धा असली 
    मैंने जब होश संभाला, अपने चारों तरफ खबरों को पाया था। हर तरह की घटनाओं को खबरें बनते, बिगड़ते, सुलझते, उनके अर्थ, अनर्थ होते देखा। इस वजह से खबरें मुझ तक अक्सर पहुंचती रहती हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने एसिड अटैक पीड़ित लड़कियों के रेस्टोरेंट खोलने की खबर पढ़ी थी। खबर पढ़कर मैंने उस रेस्टोरेंट में जाने की योजना बनाई थी, पर कहते हैं न कि आप जो योजना जितनी शिद्दत से बनाते हैं, उतनी ही शिद्दत से आपके अंदर की कायनात योजना को टांय-टांय फिस्स करने में जुट जाती है।  मेरे साथ भी एक बार फिर ऐसा ही हुआ।
    हुआ यूं कि योजना बनाने के कुछ देर बाद ही सालों पहले सफदरजंग अस्पाल में देखी कुछ तस्वीरें मेरे सामने घूम गईं। ये तस्वीरें वहां के बर्न डिपार्टमेंट के बाहर की थीं। जिनसे दहल कर मैंने मेडिकल वॉलिंटियर बनने का इरादा छोड़ दिया था। मैं एकला चलो रे टाइप का वॉलिंटियर बन गया। आप समझ सकते हैं कि कैसा मंजर देखा होगा मैंने। उन तस्वीरों ने कई सवाल भी खड़े कर दिए थे। सालों तक इन सवालों ने मुझे परेशान रखा। 
    मुझे कभी समझ नहीं आता था कि ये कैसा तेजाबी प्रेम है? आखिर किस किताब में प्रेम कि ये तेजाबी परिभाषा है? इन सवालों ने मुझे इतना परेशान किया कि मैंने अपना प्रोग्राम कैंसल कर दिया था। मुझे लगा कि आशिकी का दंभ भरने वालों के कारनामे देखने की हिम्मत मुझमें नहीं  है।  इसिलए मैं एसिड पीड़ितों से मिलने से सालों कतराता रहा। 
      समय के साथ मेरी घबराहट और डर कई घटनाओं को जानने के बाद शायद मेरे अंदर से गायब हो गई थी। फिर भी उसका प्रभाव इतना था कि मुझे इसका एहसास नहीं था। इसका एहसास कराने के लिए नियति ने अपना तरीका चुना। बिना किसी पूर्व जानकारी के मैं लक्ष्मी को देख रहा था। एक सहज सरल वातावरण में। कवि सम्मेलन में लक्ष्मी की कविता तेजाबी प्यार करने वालों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर रही थी।उस कविता को सुनते वक्त मुझे अहसास हुआ कि मेरे अंदर की घबराहट तो कब की विदा हो चुकी थी। हो सकता है ये अतिश्योक्ति लगे, लेकिन ये सच है। हालांकि न तो लक्ष्मी से और न ही दूसरी लड़की से मेरी कोई बातचीत नहीं हुई।  हां सेल्फी तो ले ही ली मैंने उस हिम्मतवाली के साथ।    
     
ये लंबे बालों में संजय शेपर्ड हैं..सब सेल्फी लेने में मस्त हैं.हीही
रह गया हिंदी कवि सम्मेलन, तो मैंने वहां कोई कविता नहीं सुनाई। मैं बेहतरीन लेखक जरूर हूं, (कोई माने न माने कि फर्क पैंदा है)
इसिलए वहां कह दिया कि मैं लेखक हूं, कवि नहीं।😃 भले कोई किताब भी न छपी हो। इवेंट में किसी कवि से परिचय वाली बातचीत भी नहीं हुई। आयोजनकर्ता जनाब संजय शेपर्ड मुझे अपनी फेसबुक की फ्रेंड लिस्ट से जाने कब अनफ्रेंड कर चुके थे। फिर भी मैं वहां था। था तो कई कवियों को सुनने का मौका मिला। सुनने के दौरान एक गड़बड़ी हुई।  उन कविताओं को सुनते-सुनते मैं अंदर ही अंदर उन्हें परखता रहा। यानि मेरे अंदर का खोता विवेचक/आलोचक/समालोचक, जिसे कविता के किसी मानक का पता नहीं,  कविताओं को परखता रहा। ऐसे जैसे शुक्ल जी के बाद हिंदी का सबसे सच्चा, सबसे बड़ा आलोचक/विवेचक वगैरह वगैरह मेरे अंदर ही हो।  
  निराला जी ने जबसे कविताओं को बंधन मुक्त किया है, तब से कई कवि पैदा हुए हैं। उन कवियों में कुछ ही कविता की लय बरकरार रख पाए। कई कवियों की कुछेक कविताएं जरूरत दमदार रहीं, पर निराला तक कोई नहीं पहुंचा। वैसे भी हिंदी में कविता करके कोई कवि जिंदगी गुजार सका हो, मुझे याद नहीं आता। गेट-टूगेदर में कुछ कविताओं को सुनकर लगा कि गद्य को एंटर मार-मार कर कविता बनाई गई है। कुछ कविताओं में तारतम्य नहीं दिखा। हां, कुछ कविताएं लय और ताल में थीं। कुछ कविताएं शुरूआत की उड़ान थीं, जो बता रही थीं कि आगाज में मेहनत है, इसलिए ये उड़ानें किसी न किसी न किसी मुकाम तक पहुंचेगी।  यानि लेदेकर कुछ न कुछ था जरूर। खैर मैं क्या सोचता हूं इससे किसी कवि को कोई फर्क नहीं पड़ता।  
    तो एक बार फिर कनॉट प्लेस की एक और शाम शानदार रही।  शायद कनॉट प्लेस के गलियारों में आवारगी करते हुए नए चेहरों के दोस्त बनने की कहानी फिर से शुरू होने वाली है।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...