सोमवार, जुलाई 17, 2017

पीएम की इजरायल यात्रा जरूरी थी- 2

यासिर अराफात और भारत का रिश्ता

(गंताक से आगे...अर्थात पिछली पोस्ट का दूसरा भाग)

फोन पर फिलिस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के मुखिया यासिर अराफात ने राजवी गांधी को सुरक्षा को लेकर लापरवाही न करने को कहा। प्रधानमंत्री रहते राजीव गांधी पर दो जानलेवा हमले हो चुके थे एक राजधानी दिल्ली में और दूसरा गार्ड ऑफ ऑनर लेते हुए श्रीलंका मेें। राजीव खालिस्तान आतंकवादियों के निशाने पर भी थे। यासिर अराफात की चिंता से पता चलता है कि विदेशी ताकतें हर कीमत पर राजीव की हत्या करना चाहती थीं। अब ये कौन सी विदेशी ताकतें हैं, इसका जवाब खुफिया फाइलों में हो सकता है। ये जरूरी नहीं की हर खुफिया जानाकरी या कूटनीतिक चालें जनता से साझा की जाएं।
      एक सवाल ये भी है कि यासिर अराफात को कैसे पता था कि कुछ विदेशी ताकतें राजीव गांधी की हत्या करवाना चाहती हैं? खबरों के मुताबिक कुछ देशों में मौजूद अपने खूफिया सूत्रों से उन्हें इसकी जानकारी मिली थी। खबरें ये भी थीं कि किसी संगठन ने एक बड़े दक्षिण एशियाई नेता की हत्या के लिए अराफात के संगठन से संपर्क साधा था। यासिर अराफात तुरंत समझ गये कि दक्षिण एशिया के जिस नेता को निशाना बनाया जाना है वो कौन है? इसके बाद अराफात ने राजीव गांधी को तत्काल इस खतरे से आगाह किया था। खैर बात जो भी हो, ये हकीकत है कि उस दौर में राजीव गांधी की सुरक्षा को लेकर कोताही बरती गई थी।
    हालांकी अराफात का भारत और नेहरू परिवार से लगाव जगजाहिर था। ऐसे में विश्वास करना मुश्किल है कि राजीव गांधी की हत्या के लिए कोई उनसे संपर्क साधता। तो क्या निशाने पर कोई और दक्षिण एशियाई नेता था? लेकिन अराफात की गहरी चिंता इसबात को खारिज करती है। ये बात साफ है कि विदेशी ताकतों के निशाने पर राजीव ही थे। शीत युद्ध के दौर में दुनिया में कई राजनीतिक हत्याएं हुईं। यासिर प्रकरण राजीव हत्याकांड को वैश्विक स्तर पर हुई राजनीतिक हत्याओं में शुमार करता है। भले कहा जाता हो कि शीत युद्ध के दौर में दुनिया दो ध्रुव में बंटी हुई थी, पर हकीकत यही है कि निर्गुट आंदोलन के कारण भारत तीसरा पोल था।
    राजीव गांधी की हत्या से यासिर अराफात काफी दुखी थे| राजीव की अंत्येष्टि पर भारत आए अराफात ने तत्कालीन पीएम चंद्रशेखर को राजीव हत्याकांड में सहयोग की पेशकश की थी। पता नहीं इस बारे में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने यासिर अराफात से बात की थी या नहीं? पर ये सच है कि आज भी भारतीय जनमानस में राजीव हत्याकांड को लेकर कई सवाल हैं। 
  (इब फिर हो गया, जाना था जापान, पहुंच गए चीन.....पता नहीं बात से बात निकलती है, और लंबे रस्ते पर निकल पड़ती है। इस बीच अमरनाथ यात्रा पर इस्लामिक आतंकियों ने हमला कर हिंदू श्रद्धालुओं की हत्या कर दी। दिल में गुस्सा काफी है। यूपी विधानसभा में खतरानाक विस्फोटक भी मिल गया। मतलब लिखने बैठो तो हर रोज कुछ न कुछ मिल ही जाता है। फिलहाल तो अगली पोस्ट मेँ अरब मुल्कों के ढुलमुल रवैये और भारत के विश्वास पर खरा न उतरने की बात करूंगा। साथ ही बात करूंगा फिलिस्तीन-इजरायल के संघर्ष में हमारे देश के बेगानी शादी के अब्दुल्ले दीवानों की। वैसे ये सीरीज दो पोस्ट में खत्म करनी थी, पर जैसा की आपको पता है कि बात निकलती है तो दायें, बाएं सबजगह घुमने लगती है। इस पोस्ट में फिलिस्तीन के यासिर यराफात से होते हुए, राजीव गांधी की हत्या तक बात पहुंच गई। मैं यासिर अराफात को लेकर हमेशा नोस्टेल्जिया में चला जाता हूं..क्योंकी अस्सी का वो दौर था ही ऐसा। क्यों था? वो फिर कभी, जब फिर किसी बात से बात निकलेगी तो बताउंगा)

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