मंगलवार, जुलाई 04, 2017

पीएम की इजरायल यात्रा जरूरी थी

      मोदी 70 साल में इज़रायल जाने वाले पहले भारतीय़ प्रधानमंत्री बन गए हैं। इस यात्रा ने कई पुराने सवालों को लोगो के जेहन में ताजा कर दिया है। आखिर किसी भारतीय प्रधानमंत्री पहले कभी इज़रायल क्यों नहीं गया? क्यों भारत ने इतने साल इजरायल का एकतरफा बहिष्कार किया? जबकि आजादी के बाद ऐसा कोई खास कारण नहीं था कि भारत ने ऐसा निर्णय लिया। फिर नेहरू कांग्रेस ने ऐसा रवैया क्यों अपनाया? 1950 में इज़रायल को मान्यता देने के बाद भी इजरायल से राजनयिक-कूटनीतिक संबंध न रखने का निर्णय लिया गया। बरसों तक भारतीय पासपोर्ट में 'ये पासपोर्ट साउथ अफ्रीका के और इज़रायल के लिए मान्य नहीं है' लाइनें लिखी जाती रहीं। बावजूद एकतरफा बहिष्कार के इजरायल भारत से रिश्ते बनाने के लिए प्रयासरत क्यों रहा? और सबसे बड़ी बात ये कि पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से मुस्लिम समाज और नेता इतना बौखलाए हुए क्यों हैं?
   दरअसल सालों तक इज़रायल से राजनयिक-कूटनीतिक संबंध न रखने की नीति के दो कारण मौटे तौर पर नजर आते हैं। एक स्वतंत्रता के तुरंत बाद रहम के तौर पर अपनाई गई तुष्टीकरण की नीति, जो कालांतर में सियासत के काऱण देश के लिए कोढ़ बन गई। दूसरे अरब देशों के पास पेट्रोल का भंडार था, जिसकी आजाद भारत को सख्त जरुरत थी। इसलिए भी भारत ने अरब देशों की नाराजगी मोल लेना ठीक नहीं समझा। ये अलग बात है कि कुछ अरबी देश भीतरखाने इज़रायल के संपर्क में थे। कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अरब देशों ने भारत को धोखा दिया। अधिकांश मौकों पर भारत की जगह वो मुस्लिम देश के नाम पर पाकिस्तान के पक्ष में रहे। आज भी अरब देशों का मोर्चा आतंकी पाकिस्तान पर प्रतिबंध न लगाकर, भारत के आंतरिक मामलों में दखल दे रहे हैं। 
    भारत का फिलिस्तीन को नैतिक समर्थन देना गांधी के अहिंसा के पदचिन्हों पर चलन के ऐलान के ठीक उलट था। अस्सी शक के अंत भारत ने फिलिस्तीन को जबरदस्त नैतिक समर्थन दिया। जबकि फिलिस्तीन का हिंसक संघर्ष गांधी के भारत की नीति से मेल नहीं खाता था। 
  भारत के नैतिक समर्थन के लिए यासिर यरापात ने पूरे जीवन आभार माना। ये हकीकत है कि हिंसक आंदोलन वाले फिलिस्तीनी संघर्ष को भारत के जबरदस्त नैतिक समर्थन के कारण कई एशियाई और अफ्रीकी देशों का समर्थन मिला। भारत में नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस सरकार ने बरसों तक इजरायल का इकतरफा बहिष्कार किये रखा, जबकि इजरायल भारत से रिश्ते बनाने की कोशिश करता रहा।
   फिलिस्तीनी संघर्ष के नेता यासिर यराफात ने जीवन पर्यंत भारत के इस समर्थन का आभार माना। इंदिरा गांधी को बहन मानने वाले यासिर यराफात आखिर तक भारत के साथ मैत्री निभाते रहे। यासिर यराफात के दौर में भारत-फिलिस्तीन की मैत्री चरम पर थी। इस कारण भी भारत ने इजरायल को मान्यता देने के बाद भी उससे कूटनीतिक संबंध नहीं बनाए थे। 
    यासिर यराफात का भारत के प्रति जो लगाव था उसका उदाहरण देता हूं। 1991 में राजीव गांधी सुरक्षा को दरिकनार कर चुनाव प्रचार कर रहे थे। जब यासिर यराफात ने टीवी पर देखा, तो वो बेहद परेशान हो गए। अराफात को पता था कि राजीव गांधी विदेशी ताकतें राजीव गांधी की जान लेना चाहते हैं। उन दिनों मोबाइल तो होते नहीं थे। किसी तरह राजीव गांधी से संपर्क बनाकर यासिर यराफात ने उन्हें चेताया बनाया।  (क्रमशः)

फोन पर यराफात ने राजीव को क्या कहा?  बहिष्कार के बाद भी इजरायल भारत के साथ संबंध बनाने के लिए लगातार प्रयास क्यों करता रहा? फिर ऐसा क्या हुआ कि इजरायल से संबंध बहाल करने के बाद भी भारतीय पीएम को इजरायल जाने में इतने साल लग गए। कब-कब अरब मुल्कों ने भारत की पीठ में छूरा घोंपा? पीएम मोदी की इजरायल यात्रा पर मुस्लिम समुदाय नाखुश नजर क्यों है?  आखिर मुस्लिम नेता ये क्यों मांग कर रहे हैं कि पीएम को फिलिस्तीन भी जाना चाहिए था? अरब देश क्या पूरे भरोसे के काबिल हैं? ऐसी क्या वजह है कि फिलिस्तीन से भारत के रिश्ते ठंडे से हैं? ऐसे ही कई सवाल आपके अंदर उछल-कूद रहे होंगे, या कहें कि कुलबुला रहे होंगे। अगर ऐसा नहीं है तो  ऊपर लिखे सवालों को तब तक बार-बार पढ़ें जबतक ये आपकी नींद न खराब कर दें। इनके उत्तर आपको अगली पोस्ट यानि संडे तक मिल जाएंगे।  ⇆⇆↲↪⇒

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