शुक्रवार, अगस्त 04, 2017

गजब का टैलेंट है मेरे में...परंतु..


तमाम कोशिश के बाद भी ब्लॉग को हर हफ्ते लिख नहीं पा रहा हूं। ये एक ऐसा काम है जो शांत चित्त से होता है। मेरे सामने ये समस्या कभी नहीं रही कि क्या लिखूं। ठीक उस डांसर की तरह जो समाचार पर भी डांस कर सकता है। दरअसल जब कई चीजें करने को हों, तो भी ऐसा हो जाता है। मेरे साथ यही है। ऐसे में टाइम मैनेजमेंट और कामों की प्राथमिकता की लिस्ट बनानी पड़ती है। ऐसा नहीं है कि मुझे ये पता नहीं है, पर अगर ऐसा करने में सक्षम होता, तो क्या बात थी।  मैं अबतक मालामाल न हो जाता। जी हां मालामाल, सफल नहीं, क्योंकि सफलता की परिभाषा हर इंसान की अपनी-अपनी होती है। मेरे हिसाब से सफलता 'संतोष' में है। ये 'संतोष जी'हमेशा मेरे से थोड़ा आगे ही चलते हैं। कभी-कभार ही सही, उनका मूड हो गया तो 'संतोष जी'  परमधन बनकर मेरे सिर पर सवार हो जाते हैं।
  फिलहाल यहां सवाल ये है कि देर क्यों होती है ? ये बात सच है कि हर कामयाब इंसान कुछ नियमों का पालन करता है। अपने काम को करते वक्त उसमें डूब जाता है। अब देश के मेगास्टार को ही ले लीजिए। उनके प्रशंसक होने न होने से इतर, आप उनकी समय की पाबंदी के कायल होंगे। सुपर स्टारडम के दौर से आजतक वो समय के पाबंद हैं। यानि सालों से लोग मिलेनियम बच्चन के सेट पर पहुचंने के समय से अपनी घड़ी मिलाते आ रहे हैं। इस आदत के कारण बिग बी को कई बार जूनियर कलाकारों का इंतजार भी करना पड़ा। जिदंगी में इतने उतार-चढ़ाव होने के बाद भी बिग बी की ये आदत बनी रही।
     यहां उनसे जुड़ी एक घटना का जिक्र करता चलूं। बीबीसी के पत्रकार मार्क मैनुअल एक बार एक फंक्शन को कवर करने रात 9.30 बजे पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां सिर्फ कैटरर्स और डेकोरेटर्स ही थे। उनकी हैरानी और खुशी ये देख कर बढ़ गई कि वहां पर अमिताभ बच्चन मौजूद हैं। अमिताभ फंक्शन शुरू होने के वक्त के मुताबिक रात 8.30 बजे ही वहां पहुंच गये थे। मार्क ने उनसे लंबी बातचीत की। अगले दिन जो रिपोर्ट छपी, उसकी सुर्खी कुछ इस तरह थी "जब शाहरूख खान ने अमिताभ बच्चन को कराया ढाई घंटे इंतजार, और सीढ़ियों पर बैठे रहे महानायक"। 1999 का ये वो दौर था जब अमिताभ बच्चन को फिल्में न के बराबर मिल रही थी। उनका सबसे बुरा दौर चल रहा था। फिर भी कहते हैं कि जो समय की इज्जत करता है, समय उसको फिर से मौका देता था। इस घटना के महज एक साल बाद, यानि 2000 में अमिताभ टीवी पर लेकर आए 'कौन बनेगा करोड़पति'। बाकि तो जैसा कि सबको पता ही है कि ''अमिताभ जहां खड़े हो जाते हैं, इतिहास वहीं से बनना शुरू होता है''।
  वैसे काम से शिद्दत से प्यार करने वाले एक और अभिनेता हैं गोविंदा। डूब कर डांसिग करने में उनका आज भी कोई सानी नहीं है। डांस करते वक्त चेहरे के भावों को बरकरार रखने में अच्छे से अच्छे डांसर कामयाब नहीं हो पाते। गोविंदा इसके अपवाद हैं। गीत के बोल हमेशा गोविंदा के साथ थिरकते दिखते हैं। हालांकि वो समय के पर न पहुंचने के लिए बदनाम रहे। ये बात भी उड़ी की उन्होंने एक फिल्म के सेट पर उनको काफी इंतजार कराया। जबकि उन दिनों गोविंदा तीन शिफ्टों में काम कर रहे थे। उन्होंने हाल ही में एक शो में बताया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। कारण कुछ और था, और बदनाम हो हो गये। 
    अब सवाल ये है कि हम ऐसा क्यों नहीं कर पाते। खासकर तब, जब ये जानते हैं कि हम काफी क्रिएटिव हैं। (अपनी तारीफ तो करनी  ही पड़ेगी) इसका एक जवाब तो ये है कि दुनिया में एक ही अमिताभ बच्चन होता है। गोविंदा भी लाखों में एक बनता है। दूसरा जवाब ये है कि सबकुछ गिण हममें आ गये तो बाकि का क्या होगा?। तीसरा जवाब .....चलो छोड़ो क्या बताएं(मतलब कितने बहाने बनाएं) जैसा की सबको पता है कि मैं 'देर करता नहीं, देर हो जाती है'..अच्छा है 'हिना' फिल्म में ये गाना आ गया..वरना देर होने पर खुद ही भुनभुनाते रहते। खैर चलिए कोशिश करते हैं ब्लॉग अपडेट करने की आदत डालने की। वादा बिल्कुल नहीं करूंगा, कोशिश ही करूंगा। आपने वो शेर सुना ही होगा कि "मिलने की तुम कोशिश करना, वादा कभी न करना, वादा तो टूट जाता है" । अब ये मत बताना कोई कि वादा वो होता है जो टूटता नहीं। वगैरह वगैरह
(देखा न मेरा टैलेंट...लिखने के लिए सब्जेक्ट की कोई कमी नहीं है़...बस स्टार्ट होने की देर है, हालांकि पिछली पोस्ट का लंगर किनारे बांधा हुआ है, उसकी अधूरी यात्रा भी पूरी करनी है, देखिए उसकी यात्रा कब पूरी होती है। पता नहीं क्यों एकाग्रता गायब हो गई है। आदत रूपी लेखन जिसके कारण थम सा गया है। शायद पता है कि क्या चाहिए, पर कर नहीं पा रहा) 

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