रविवार, अगस्त 27, 2017

हिंदू-मुस्लिम आगे, भारतीय पीछे

     देश के हालात बड़े ही चिंताजनक हो चले हैं। एक बाबा पर इल्जाम लगता है, और वो जेल पहुंच जाता है। उसके समर्थकों की हिंसा और रोकने के दौरान 50 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। मरने वाला क्यों मरने को तैयार हो जाता है ये समझ नहीं आता। अराजकता का माहौल पिछले कई सालों से देश में है। पहले ही नॉर्थ ईस्ट, कश्मीर, केरल, यूपी के कई हिस्सों में अवैध घुसपैठियों ने हालात खराब कर रखें हैं। उसपर पाकिस्तान परस्त लोग घुन की तरह देश के लिए मुश्किल पैदा कर रहे हैं। देश में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को सम्मान देने तक से लोग मना करने लगे है। उसपर इसतरह धर्मगुरूओं के चेलों की वेवजह की हिंसा। देश में जानी नुकसान तो हो ही रहा है, खरबों की संपत्ति भी स्वाहा हो रही है।  
     बेवजह की हिंसा देश के कई इलाकों में हो रही है। कारण चाहे जो हों, पर देश की आर्थिक प्रगति पर इसका असर पड़ता है। ये हिंसा सिर्फ गरीबी को ही बढ़ावा देती है। गरीबी से निजात पाने की दिशा में कोई फायदा नहीं होगा। हिंसा देश के संसाधनों पर अनावश्यक दवाब डालते हैं। भीड़ में शामिल होकर लोगों को लगता है कि वो कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें हर चीज को जलाने की छूट मिल गई है? नतीजा क्या होता है? बेवजह गोलीबारी या भगदड़ से मासूमों की जान जाती है। दिहाड़ी मजदूर को भूखे पेट सोना पड़ता है। व्यापारियों को आगजनी से लाखों का नुकसान उठाना पड़ता है। कई व्यपारियों की तो जमा-पूंजी लूट जाती है।  
     इसी शोरगुल के बीच देश के दुश्मन अपनी शातिर चाले चलते रहते हैं। आतंकी अपनी कार्रवाई करते रहते हैं। हिंसा का लोग एकजुट होकर विरोध नहीं करते। हैरत तो ये देख कर होती है कि पढ़े लिखे लोग भी राजनीति और धार्मिक दुष्चक्कर में फंस जाते हैं। एकजुट होकर सवाल पूछने की जगह, राजनीतिक या धार्मिक छतरी के नीचे खड़े होकर सवाल करते हैं। 
      मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग ये कहकर किनारे हो जाता है कि ये हिंदूओं का मामला है। वहीं एक धड़ा मोदी पर फायर हो जाता है। वो धड़ा केरल और बंगाल की हिंसा पर चुप रहता है। मुस्लिमों और सेक्यूलरों का ये धड़ा हिंसक भीड़ पर फायरिंग करने की वकालत करता है। यही धड़ा कश्मीर में पैलेट गन के इस्तेमाल पर छाती पीट-पीटकर रोता है। पूछता है कि क्या कश्मीर में पत्थरबाजी करते लोग देशवासी नहीं है। ये विधवा विलाप करने वाले यही तर्क बाबा के समर्थकों पर लागू नहीं करते। इस तरह के सलेक्टिव विरोध करने का मकसद लोगो को आपस में लड़ाना ही है। जबकि समय की मांग है कि कश्मीर में पत्थरबाजों को भी भारतीय सुरक्षा बलों की बंदूक की नाल के आगे रखा जाए। 
      सवाल बड़ा सीधा सा है। आखिर इस तरह कि हिंसा कहीं भी हो, इसका एक ही सुर में विरोध क्यों नहीं होता? हर धर्म का एक बड़ा धड़ा राजनीति से किनारे रहने के नाम पर चुपचाप पड़ा रहता है। जबकि हालात देर-सबरे उस धड़े को भी तंग करता है। ये वो लोग होते हैं जो बिना विवाद के जीवन जीना चाहते हैं । अफसोस ये है कि उन्हें समझ नहीं आता कि शांति भी तभी रहती है, जब उसकी रखवाली करने वाले लोग सजग हों। 

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