शनिवार, सितंबर 16, 2017

हिन्दी पर हाय-हाय क्यों?

   
हिंदी दिवस गुजर गया। इसके साथ ही धूमधड़ाका भी खत्म हो गया। दो दिन के लिए हिन्दी की सेवा भी हो गई। लोगों ने हिन्दी की प्रगति में आई बाधाएं भी गिना दी। बाधाओं की जिम्मेदारी का ठीकरा भी किसी पर फोड़ दिया। नई नस्ल को लतिया दिया। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों को गाली दे दी। यानि दो दिन में रस्म निभा दी गई। अब साल भर बाद दोबारा सोचा जाएगा। यानि इस साल हिन्दी सेवा की इतिश्री हो गई। सरकारी कार्यक्रमों को छोड़ दिया जाये, तो लगभग हर जगह ये ही हालत है। 

तर्क भी अजीबो-गरीब
    कई लोग सवाल करते हैं कि हिन्दी दिवस की जरूरत क्या है? ऐसे में सवाल उठता है कि हरदिन हिन्दी की सेवा कैसे हो? लोग कहते हैं कि वो रोज हिन्दी में बात करते हैं। हर पार्टी में हिन्दी बोलते हैं। ये तर्क ऐसे हैं, जिसे सुनकर कुतर्क भी आत्महत्या कर ले। ऐसे में पूछने का मन करता है कि जब मातृभाषा हिन्दी है, तो हरदिन तो हिन्दी में ही बोलोगे न। किसी को गाली देनी होगी, तो अपनी मातृभाषा में ही दोगे न। रह गई पार्टी में जाने की बात। तो जनाब साल में कितनी पार्टी में जाते हैं आप ? कई लोगो को पार्टी में बोले जानी वाली स्पोकन इंग्लिश तक नहीं आती, तो हिन्दी में ही बात करोगे न। फिर काहे को बकबक करते हो? बेकार की  डींग मारते हो?

ठीकरा मीडिया के सिर ? 
   खराब हिन्दी का ठीकरा समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर भी फोड़ा जाता है। पता नहीं, कब शुद्ध हिन्दी की पूरी जिम्मेदारी समाचार पत्रों पर लादी गई थी? समाचार के हर माध्यम का सीधा फंडा है, वो लिखो जो अधिकांश समझ सकें। यानि सीधी-साधी हिदुस्तानी भाषा। पूरे देश में हिंदी अलग-अलग तरह से बोली जाती है। इसलिए समाचार के हर माध्यम में इसकी झलक दिखती है। तिलक, गांधी ने तक समाचार पत्रों में आम लोगो की भाषा के इस्तेमाल की पैरवी की है। हां, समाचार पत्रों में जो हिन्दी साहित्य छपता है, उसकी हिंदी शुद्ध और सरल होती है।

साहित्य की हिन्दी 
    हिन्दी साहित्य को लेकर हमेशा से ही मगजमारी होती रही है। साहित्य क्योंकि भाषा और संस्कृति का दर्पण होता है, इसलिए इसमें शुद्धता पर जोर दिया जाता है। इसके अलावा साहित्य सरल बोलचाल की हिन्दी में भी रचा जाता है। साहित्य की ये हिन्दी ही हमारी आपकी थाती होती है। जिसे समझने और जानने के लिए हमें समय निकालना चाहिए। जबकि अधिकतर लोग सीखने और समझने की जगह, बच निकलने की कोशिश करते हैं। उनका तर्क होता है कि ये हिन्दी काफी कठिन है। जबकि हिन्दी बहुत ही वैज्ञानिक भाषा है। जिससे इसमें सरल और सहज प्रवाह रहता है। इसे लेकर हिन्दी में निरंतर चिंतन भी होता है। ये आपकी-हमारी कमजोरी है, जो हम इससे अनिभज्ञ रहते हैं। 

साहित्यक हिन्दी बनाम नई हिन्दी 
    आजकल नई हिन्दी का झंडा लेकर लोग सोशल साइट्स पर कूदे पड़े हैं। इनका कहना है कि बोलने में हम अंग्रेजी के कई शब्द इस्तेमाल करते हैं। इसलिए कहानी-किस्से लिखने में इससे ऐतराज क्यों? उनकी मांग है कि अंग्नेजी शब्दों वाली कहानियों, उपन्यासों को हिन्दी साहित्य में जगह दी जाए। वर्तमान अधिकांश साहित्यकार इसका विरोध करते हैं। दरअसल हिन्दी भावों की अभिव्यक्ति करने में पूर्ण सक्षम है। इसलिए हिन्दी साहित्यकार उनकी मांगों से सहमत नहीं होते। शुद्ध हिन्दी में साहित्य रचने वालों से समर्थन की मांग करके, ये झंडाबरदार उन्हें भी असमंजस में डाल देते हैं। खुद भी बेकार की बहस को जन्म देते हैं।

साहित्य किसी की मोहताज नहीं
    मेरा मानना है कि नई और पुरानी हिन्दी नाम की कोई चीज नहीं है। समय के हिसाब से बोलचाल की भाषा बदलती रहती है। बोलचाल की भाषा का साहित्य में बहुतायत में इस्तेमाल होता आया है। कालांतर में इस तरह के लेखन को साहित्य के किसी न किसी हिस्से में  शामिल कर लिया जाता है। हिन्दी के मानकों से समझौता किए बिना बहुत साहित्य रचा जाता रहा है। इसलिए इस नई हिन्दी का विरोध या नई हिन्दी का आंदोलन, जैसा कुछ है ही नहीं। ये सब बकवास बातें हैं। दोनो ही धाराएं और बातें हिन्दी के सहज प्रवाह में योगदान देती हैं। 

भाषाविदों का घमंड
    हिन्दी के प्रकांड विद्धान कहे जाने वालों का घमंड भी एक रोड़ा है। आलोचना के नाम पर सब गलत हिन्दी पर निशाना साधते हैं। सिखाने के नाम पर ये इतनी क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं कि आम आदमी के तिरपन कांप जाते हैं। ये एक बार में सबकुछ बदलने की प्रवृति से नए लेखक सीखने से कतराने लगते हैं। वहीं कई विद्वान चलन और बदलाव का तर्क देते हैं। इसकी आड़ में वो गलत शब्दों के उच्चारण और लिखने को सही ठहराते हैं। ये विद्वान हिन्दी का बेड़ागर्क ही करते हैं। जबकि सही बताने पर, बंदा सही लिखने-पढ़ने की कोशिश करता है। हालांकि ऐसा घमंड हर भाषा के कई विद्वानों के अंदर होता है।

हिन्दी की जड़ में मठ्ठा 
    अनेक बोली और संस्कृत की मजबूत नींव, हिन्दी की ताकत है। देशज शब्द हिन्दी को ताकतवर और संप्रेषण की आसान भाषा बनाते हैं। पिछले कई सालों से हिन्दी की ताकत को तोड़ने की कोशिश हो रही है। ये काम मौकापरस्त साहित्यकार, नेता और पत्रकार करते आए हैं। बोली को भाषा का दर्जा देने के नाम पर राजनीति और मौकापरस्ती का खेल खेला जा रहा है। जिसका विरोध हिन्दी के बड़े नाम भी जबरदस्त तरीके से नहीं करते। कठोर सच है कि हिन्दी को नुकसान सियासतदां और छुटभैये साहित्यकार ही पहुंचा रहे हैं। 

पाठक गायब हैं
    जाहिर है कि ये बातें किसी आम पाठक को चुभती है। पाठक सिर्फ पाठक होता है आम भाषा का। पाठक उन किताबों को ढूंढता है, जिसमें उसकी दिल की बातें कहीं गई हों। अपनी समझ अनुसार वो साहित्य की भाषा का चयन कर लेता है। कई गोष्ठियां मुशायरे और पुरुस्कार मौकापरस्त लोगों के कब्जे में होते हैं। जिसकी आड़ में मौकापरस्त और नफरत फैलाने वाले लोग अपना उल्लू सीधा करते हैं। जो भी उनकी पोल खोलता है, उससे वो लड़ने-मरने को उतारू हो जाते हैं। यही इनकी पहचान है। जबकि पढ़ने-लिखने, तहजीब की बात करने वाले लोगों को लड़ने की क्या जरुरत है? सीधी सी बात है, किराए के शब्दों से कब तक काम चलेगा। जब अंदर साहित्याकर या लेखक हो ही न, तो कबतक मुखौटा काम आएगा। भारत में यही सच हिन्दी की सहोदर उर्दू का भी है। 

#अंतर्रराष्ट्रीय_हिन्दी_ब्लॉगिंग 
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