सोमवार, अक्तूबर 09, 2017

आलस और लापरवाही न ही करें

    लापरवाही और आलस अच्छी भली जिन्दगी को भी कष्टकारी बना देते हैं। हमसब ने बचपन में सबने एक कहानी पढ़ी होगी। चिड़िया और उसके बच्चों की, जो खेत में रहते थे। उस खेत की फसल पक चुकी थी। खेत पर रोज किसान आता था। रोज कहता फलां-फलां से कहकर पकी हुई फसल कटवाउंगा। रोज शाम को जब चिड़िया लौटती, डरे बच्चे उसे सारी बात बताते। चिड़िया बच्चों को सांत्वना देती कि घबराएं नहीं। रोज किसान आता, और वही बात दोहराता, फलां से कहकर कल फसल कटवाता हूं। शाम को घर लौटकर चिड़िया सहमे बच्चों को समझाती कि कल फसल नहीं कटेगी। खैर एक दिन चिड़िया को बच्चों ने बताया कि किसान कल खुद फसल काटने की बात कह रहा था। ये बात सुनकर चिड़िया बोली अब घौंसला बदलने का समय हो गया है। सारांश ये कि कहानी से हमें सिखाया गया था कि अपना काम खुद करो। दूसरों पर विश्वसा करने से बेहतर है खुद पर विश्वास करो। 
     कहानी हम सबने सुनी होगी। उसपर कभी-कभी अमल भी करते ही होंगे। फिर भी इतना बड़ी शिक्षा को हम जीवन का हिस्सा नहीं बना पाते। खासकर जब कोई महत्वपूर्ण काम करना हो। ज्यादातर ये काम आपके एक दिन का कुछ समय मांगते हैं, बदले में काफी आरामदेय दिन देते हैं। पता नहीं आजकल के बच्चों को ये कहानियां स्कूल में पढ़ाई जाती है या नहीं। वैसे पढ़ाई भी जाती होगी, तो भी इसकी शिक्षा को हमें अमल में लाते न देखकर वो भी आलसी और लापरवाह हो जाते हैं। यानि हममें से ज्यादातर पर उपदेश बहुकुशल तेरे वाली कहावत चरितार्थ करते हैं। 
    कहानी का सबब इसलिए याद आया कि खुद के कुछ काम अटके हुए थे। जो आलसपन और लापरवाही से अनावश्यक बोझ बन गये। ये लापरवाही और आलसपन हम अनजाने में अपने आसपास के लोगो में भी फैला देते हैं। खासकर उनमें, जो आपकी तरफ देखते हैं। बच्चें इनमें सर्वप्रथम आते हैं। हमें ये भी याद रखना चाहिए कि बड़ो के लिए बच्चों की कोई उम्र नहीं होती। ये कहावत में नहीं, हकीकत में भी है। यहां तक की आसपास के बच्चे भी आपसे सीखने लगते हैं। जाहिर है ऐसे में हमें बच्चों के सामने आदर्श रखना होगा, चाहे कितनी भई दुश्वारी हो।
        वादों को पूरा करने में लापरवाही भी इसी का एक हिस्सा है। जरूरी नहीं कि आप वादा पूरा न करना चाहते हों। कई बार चाहकर भी आप वादा पूरा नहीं कर पाते। साथ ही ये भी सच है कि कई बार लापरवाही या आलसीपन आपको काहिल बना देता है। आप अपना वादा सक्षम होने के बाद भी पूरा नहीं करते। नतीजा ये होता है कि आपकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। खैर चलिए, शब्बा खैर करते हैं फिलहाल, अगली बार तक बात करने के लिए। जय हिन्द

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