मंगलवार, अक्तूबर 31, 2017

देश का सरदार को नमन



सरदार पटेल देश की वो शख्सियत थे, जिन्होंने हर जिम्मेदारी को बाखूबी निभाया।  गांधी के उन अनुयायियों में, जिन्होंने उनके हर आदेश को अपने से ऊपर माना। जब जो बापू ने कहा, उन्होंने वो किया। इसमें कोई शक नहीं, कि एक नेता में जिस धैर्य, सूझबूझ की जरूरत होती है, वो सब सरदार पटेल में थी। भारत हमेशा उनका ऋणी रहेगा। अंग्रेजों ने खुंदक में कोशिश की थी, कि वो पीछे अराजक भारत छोड़कर जाएं। ये भारत का सौभाग्य था, कि सरदार पटेल सरीखे जीवन के रणक्षेत्र में तपे-तपाए नेता भारत के पास थे। 
  सरदार ने जीते-जी जो भारत हमें सौंपा था उसे भी हम नहीं बचा पाए। वो पटेल ही थे, जिन्होंने भारत के अंदर बनने जा रहे दो पाकिस्तान को सख्ती से कूचला। वो पटेल ही थे, जिन्होंने बिखरी रियासतों के दिमाग की बत्तियां जलाईं। जिस कारण वो सब भारत में विलय के लिए तैयार हुए। एक कश्मीर का मसला ही था, जो पंडित नेहरू ने अपने पास रखा। नतीजा आज सारी दुनिया के सामने है। कश्मीर भारत समेत दुनिया के लिए नासूर बन चुका है। वरना तो पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत ने आधुनिक दुनिया में छलांग तो लगाई, पर बदले में उसे, कश्मीर और अरूणाचल के अपने कई इलाके गंवाने पड़े। 
     ये भी कड़वा सच है पहली बार देशभर में सरदार पटेल के जन्मदिन को इतने बड़े  पैमाने पर मनाया गया। पहली बार देश के नौनिहालों को पता चला कि 31 अक्टूबर  सिर्फ इंदिरा गांधी की शहादत का दिन नहीं है। इसमें शक नहीं कि सरदार पटेल जैसी शख्सियतों को नजरअंदाज करने की कोशिश खूब हुई। अगर ऐसा नहीं होता तो, राजीव गांधी को मरणोपरांत भारत रत्न देते वक्त सरदारत पटेल को भारत रत्न नहीं मिलता। 
    भले सरदार पटेल जैसी शख्सियतें किसी सरकार की मोहताज नहीं। फिर भी ये सच है कि विरासत को अगली पीढ़ी को सही तरीके से सौंपा जाना चाहिए। मगर  पिछले कई दशकों से ऐसा नहीं हो रहा था। जैसे-जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियां भूलोक से विदा हो रही थीं, अगली पीढ़ी की यादों का टोकरा खाली होता जा रहा था। कम से कम पिछले कुछ सालों से, राजनीतिक फायदे का ही सोच कर, सरदार पटेल सरीखे महानतम नेताओं को याद तो किया जा रहा है। लोगो में उनके बारे में जानने की जिज्ञासा तो जागी है। 

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