रविवार, दिसंबर 24, 2017

पत्रकार ही बने रहो यार

    कहते हैं कि लोकंतत्र में विपक्ष को मजबूत होना चाहिए, ताकि सत्ता निरंकुश न हो सके। कहावत अपनी जगह सही है, पर मेरी नजर में हद से ज्यादा भी जरूरी नहीं है। जीवंत लोकतंत्र में इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। पांच साल के बाद जनता अपने हिसाब से फैसला कर ही देती है। खासकर भारत जैसे देश में, जहां हर साल राजनीतिक दल को किसी न किसी राज्य में चुनाव का सामना करना पड़ता है। एकबार ऐसी गलती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाकर की थी। जनता ने चुनाव होते ही उत्तर भारत से कांग्रेस का सुपड़ा साफ कर दिया। उसके बाद किसी पार्टी या नेता ने ऐसा करने की जुर्रत नहीं की है। इसलिए जब राजनीतिक विश्लेषक विपक्ष के मजबूत होने की बात दोहराते रहें, तो समझ जाइए कि वो खरी-खरी बोलने से बच रहे हैं। 
     गुजरात में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन के बाद से यही हो रहा है। इन नतीजों के बाद विश्लेषक कांग्रेस की जमकर तारीफ करने लगे। ये दूर्भाग्य है कि राजनीतिक विश्लेषक अधिकतर, किसी न किसी पार्टी से बुरी तरह से प्रभावित नजर आते हैं। किसी पार्टी की तारीफ करना या उसका सदस्य होना गलत बात नहीं है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक की भूमिका निभाते वक्त निष्पक्ष रहना चाहिए।
   कई विश्लेषक या पत्रकार पलटीमार होते हैं। ये अक्सर कालीदास/तेनाली राम के मशहूर वाक्य 'बालक न बालिका' का इस्तेमाल करता है। इस वाक्य में 'कोमा' का प्रयोग बालक या बालिका के पैदा होने के हिसाब लगा लेते हैं। इनसे बातों में कोई आसानी से नहीं जीत सकता। जिसकी सरकार बनी, उसके यहां कबीर का दोहा 'निंदक नेडे़ राखिए, आंगन कुटी छवाए' सुनाकर, उनके आंगन में डेरा जमा लेते हैं। नेता भी ऐसे पत्रकारों को बखूबी जानते हैं। इन पत्रकारों के लिए 'आम चुनाव' चुनाव न होकर जंग होती है।
     पत्रकारिता के धुरंधर अक्सर एक जुमले 'पत्रकार स्वभाव से सत्ता विरोधी होता है' का बहुत इस्तेमाल करते हैं। ये ऐसी थोथी दलील है जिसका कोई मतलब नहीं है। हकीकत ये परिभाषा वामपंथियों पर लागू होती है। होशियारी से वामपंथी पत्रकारों ने इसमें वामपंथी की जगह पत्रकार शब्द घुसेड़ दिया गया है। जिसे कई पत्रकार अपने को निष्पक्ष और सिद्धांतवादी दर्शाने के लिए बह्मवाक्य की तरह इस्तेमाल करता है।   
      इस एक थ्योरी ने पत्रकारिता को जबरदस्ती विद्रोही का चोला ओढ़ा दिया है। जबकि सही मायने में एक पत्रकार सिर्फ पत्रकार होता है। जनता और सरकार  के बीच जब संवाद टूटने लगता है, तब वो उसे जोड़ने का काम करता है। वास्तुस्थिती से सरकार और जनता को अवगत कराता है। इसलिए इसे लोकतंत्र का चौथा खंभा नाम कहा जाता है।  
     आजकल ज्यादातर पत्रकार आईएएस फेल हैं। पत्रकार बनने के पीछे इनकी मानसिकता सत्ता के नजदीक रहने या उसे हिलाने की ही रहती है। पत्रकार बनने की इच्छा लेकर नई पीढ़ी भी सामने नहीं आ रही। टेलीविजन का आकर्षण उन्हें यहां खींच ला रहा है। फिलहाल इस ग्लैमर पर चर्चा फिर कभी करेंगे। ये चर्चा करने लायक इस लिए है कि हर चमकने वाली चीज अगर सोना नहीं होती, तो जरूरी नहीं कि हर चमकने वाली चीज पीतल ही होगी। समझे कि नहीं....जय श्री राम
    
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