बुधवार, फ़रवरी 14, 2018

ये लाल रंग, और बंसत वाले बाबा वैलेंटाइन्स

     लो फिर से सेंट वेंलटाइन सेंटी करने आ गये। अभी बंसत से मिले नहीं है कि प्रेमियों का नवरास का आखिरी दिन भी आ गया। बाबा वेंलटाइन तो निकल लिए धागा बांधते हुए, छोड़ गये यहां कूटते-पीटते, कत्ल होते आशिकों को। 
   क्या फर्क पड़ता है कि मदनोत्सव कहें या वंसतोत्सव भारत में तीन महीने डेरा डाले रहता है। उसको पूजने वाले देश में अब फतवों की, फरमानों की ज्यादा चलती है। जाने कैसे छह ऋतुओं वाले देश में ये अनजाना अनदेखा डर हर ऋतु पर हावी हो गया है? 
     प्रेम देखते-देखते लव जेहाद में बदल गया, खाप की पंचायत में कत्ल हो गया। हाल तो ये है कि प्रेमियों के बीच दूत का काम करते आ रहे बादल अब तो बरसने तक को तैयार नहीं होते। किसी को पता ही नहीं चला कि ढाई आखर का प्रेम पढ़ाते कबीर को जाने कब दफा कर दिया गया यहां से। 
   ये लाल रंग भी अजीब है। जिसपर पड़ जाता है, उसे छोड़ता नहीं। लाल रंग वाला गुलाब प्रेमियों के लिए प्यार की निशानी होता है। यही लाल रंग खापों, लव जेहादियों और फतवाधारियों को भी भाता है, पर बहते खून के रूप में। लाल खून बहता देख इन दरिंदों की आत्माओं को सुकुन मिलता है। अब चाहे अरब के जंगली लोगों की तरह गला रेत कर अंकित का बहाया लाल रक्त हो, या आन के नामपर कट्टे, रिवाल्वर की नली से निकली गोली से बहा लाल रक्त हो। जानेे ऊपर वाले की कैसी माया है कि  रंग लाल एक ही है, पर अलग-अलग जगह ये रंग अपना रंग बदल लेता है।     खैर ये उल्टा राग आज वैलेंटाइन के दिन गाना पड़ रहा है। कहते हैं कि उम्मीदों का दामन मत छोड़िए। कोशिश करते रहिए, लोहे के पेड़ भी हरे हो जाएंगे। पहाड़ों के सीने से ही नदियां बहती हैं। वैसे भी हर त्यौहार तो दुखों को किनारे कर मुस्कुराने के लिए होता है। फिर इस मौके पर मैं क्यों राग उलटा गा रहा हूं? मैं तो हर बार खुले दिल से बांहे फैलाकर इनका स्वागत करता हूं। चाहे ये किसी भी रूप रंग में हों।
  कहने वाले भले बाबा वैलेंटाइन को बाहरी बताएं। अपना तो इतना ही कहना है कि भले बाबा वैलेंटाइन पूरे यूरोप, अमेरिका, दुनिया जहां का चक्कर काटकर भारत आए हों, लेकिन इस दुनिया में तभी न आए, जब भारत में बसंत अपना डेरा डालता है। यानि फरवरी में। तो ये पराए कैसे हो सकते हैं? वैसे भी संत कहा जाता है उन्हें, और संत कभी पराए नहीं होते। हमेशा अपने ही होते हैं। 
     तो चलिए देखते हैं बाबा वैलेंटाइन और बसंत किस-किस के कांधे पर सवार हैं? क्योंकि वो अक्सर किसी के अधरों में, किसी के दिल में, किसी की आंखों में, किसी की मुस्कुराहटों में, तो कई बार फूलों में, पत्तों में, झूमती हवा में, नरम धूप में, हरी घास में, लहलहाते खेतों में, बलखाती उछलती-कदूती चलती अल्हड़ नदियों में, धीर गंभीर सागर से निकलकर तट से टकराती लहरों में, जहां मन में आता है, रम जाते हैं। ये दोनों कई रूपों में, कभी इतंजार में, कभी इकरार में, कहीं इनकार के पीछे, तो कहीं सरहदों पर हर मौसम में तैनात रखवालों के जोश में, बुलंद हो जाते हैं। फिलहाल मैं तो चला इनको देखने, आपसे मिलें तो बताइएगा कि किस रंग में मिले आपको? तो मेरी तरफ से जय हो अल्हड़ बंसत के दूसरे रूप बाबा वैलेंटाइन की। 
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