शनिवार, अप्रैल 21, 2018

वो कहानी किस्सों की बातें

   
कहानी की किताबें मिल जाएं, तो फिर बात ही क्या है। दुनिया में किताबें पढ़ने का सबसे बढ़िया मौसम सर्दी, गर्मी और बरसात है। प्यार करने के मौसम भले पांच हों, पर किताबें इन्हीं तीन मौसम के इर्द-गिर्द पढ़ी जाती हैं।  सर्दी की धूप हो, छत हो या पार्क, कहीं भी लेट जाइए किताब लेकर। जी हां, पार्क में भी लेट कर पढ़ने का सुख हासिल किया जा सकता है। पहले छतों पर नारियल की रस्सी वाली खाट होती थी। जिसपर एक चादर बिछाकर सोने से शरीर को कई दर्दों से छुटकारा भी मिल जाता था।  किताबों की आड़ में कई बार पड़ोसी- से आंखे भी चार हो जाती थीं। इस नैन-मटके का आनंद ही अलग था। सर्दी की धूप, या गर्मी की शाम अड्डा छत पर ही जमता था। कोर्स की किताबें भी पड़ोसी-पड़ोसन से बातें करने का खूबसूरत बहाना देती थीं। 
     धीरे-धीरे नारियल की रस्सी लोगों को चुभने लगी, और प्लास्टिक की रस्सी वाले फोल्डिंग पलंग आने लगे। जिससे धूप में बैठकर पढ़ने का सुख तो मिला, पर छोटे-मोटे दर्द से निजात पाने का नुस्खा घरों से विदा हो गया। साथ ही विदा होती गई किस्से-कहानी पढ़ने की आदत। तेजी से करियर बनाने के चक्कर में पढ़ना जारी रहा, पर किस्से, कहानियों की जगह प्रतियोगी किताबों ने ले ली। मजबूरी थी, आर्थिक सुरक्षा वक्त की जरूरत थी। समाज आगे बढ़ता गया, पर कोई न कोई परिपाटी पीछे छूटती चली गई। सम्रग समान विकास की नाकामी ने बूरी तरह से असर डाला हम लोगों पर। 
  शहरों में किसी का घर उस जमाने में पूरे गांव का घर हुआ करता था। बढ़े शहरों में गांव के लोगो के बसने के साथ ही शहरों में किसी को किसी सरकारी काम से, कोर्ट कचहरी के चक्कर में आना पड़ता था, तो वो सीधे गांव के ही चाचा, काका के घर में जाता था। शहरों में जात-पात का पता नहीं होता था। गांव का हर बड़ा चाचा, ताऊ, मामा ही हुआ करता था। धर्म तक कई लोगों के यहां गौण था। .............(क्रमश:)

#अतंर्राष्ट्रीय_हिन्दी_ब्लॉगिंग 
#हिंदी_ब्लॉलिंग 
#ब्लॉगर 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...