सोमवार, मई 07, 2018

वो किस्से, वो कहानी की बातें-2 ..रोहित

मेरा प्रगोटत्सव 4 मई 
   जिन्दगी इस 4 मई को एक कदम और आगे बढ़ गई। साथ ही बढ़ गई कुछ सपनों को आगे ले जाने की जद्दोजहद तो कुछ को तिलांजलि दे दी। अबतक जिंदगी बिंदास तरीके से जीनेमेरा फलसफा आधे गिलास की तरह रहा है। ये बिंदासपन इलबिल्ट होता है। जो समय-समय पर अलग-अलग लोगों को उनके हिसाब से दिखती रही। कई लोगो ने प्रभावित होकर बिंदास कहा। कई लोगो ने नाकभौं सिकोड़ी। इन सबसे मैं काफी समय तक मै बेफ्रिक रहा। अपने में मस्त-मलंग ही रहा मैं। दिक्कत तो तब शुरू हुई, जब मैं इनपर प्रतिक्रिया देता रहा। नती जा ये रहा कि मस्तमलंग इंसान यानि मुझमें मिठास काफी ज्यादा हो गई। मुझे मधुमेह ने जकड़ लिया। 
    सच कहूं तो अपने से दुखी लोग, दूसरों को सुखी नहीं देख सकते। जीवन की ईएमआई की आपाधापी में किसी दूसरे को अपने से कम सैलरी के बाद भी खुश देखकर ज्यादा लोग नाकभौं ही सिकोड़ते हैं। यही वो लोग होते हैं जो समाज को बर्बाद कर देते हैं। समाज की सहजता को काफी मुश्किल बना देते हैं। खैर इन सबसे इतर बात ये है कि ऋषि दत्तात्रेय के 40 गुरू की तरह मैंने भी-अलग लोगो से अलग-अलग चीजें सीखीं। कुछ बातें तो आपके अंदर अपने संस्कारों से आती हैं। कई यचीजें बचपन के माहौल से आती हैं। कई चीजें किताबें आपको बताती हैं, जो बाद में जीवन में दिखती हैं। कई चीजें आप लोगो से मिलकर सीखते हैं। 
   इन सब चीजों के बीच मेरी जिंदगी मस्त चलती रही है। अकेलेपन ने मुझे कभी तंग नहीं किया, तो ये बिल्कुल झूठ होगा। अकेलेपन को इतना हक तो है कि वो थोड़ा-बहुत मुझे तंग करे। सही मायने में मैं इसी के कारण न तो भीड़ में अकेला होता हूं, न ही अकेले रहने के दौरान परेशान। बस जिस वक्त मैने अपने को बदलने की कोशिश की, बटांधार वहीं हो गया। पैसा हर कोई कमाना चाहता है। मैने भी चाहा, मेहनत भी जमकर की। प्रतिफल उतना नहीं मिला, पर कोई काम पैसे के कारण रूका नहीं। ये सीख बचपने में पिताजी से मुझे मिल गई थी। मेरी नजर में ये पिता के आशिर्वाद का फल रहा है। मां लक्ष्मी का आशिर्वाद रहा। 
  सीखने-सीखाने के बीच, इतने लंबे समय में एक खास अंतर समाज में नजर आ रहा है। जैसे-जैसे लोगो के पास पैसा आता जा रहा है, दिलों की दूरियां काफी बढ़ने लगी है। हंसते-मुस्कुराते हुए जीने की कोशिश के बीच मैंने पाया है कि धीरे-धीरे सगे लोगो के बीच, रिश्ते ऐसे हो गए हैं, जैसे पहले कभी कुढ़ते रिश्तेदारों के साथ होते थे। उल्टा अब दूर के रिश्तेदारों के बीच आप सगे से ज्यादा खुलकर जीवन बिताते हैं। पारिवारिक मूल्यों में ये परिवर्तन समाज के लिए घातक है। छोटे शहरों से बड़े शहरों में जाकर रहने में भी परिवर्तन आया है। जो अपने जड़ से उखड़कर आता है, उसे अपने घर, अपने लोग याद आते हैं। हालांकि उनकी यादों में, पहले की पीढ़ी से उखड़कर आए लोगो की तुलना में कम लोग होते हैं। जाहिर है ये लोग 21वीं सदी में दूसरे शहरों में उखड़कर पहुंचे हैं। इनके मूल्य काफी अलग हैं। ये मूल्य छोटे शहरो, गांवों, कस्बों से अपने साथ लेकर आए हैं। ये सोच शहर से वहां पहुंचे, या शहर में रहने वाले रिश्तेदारों को देखकर वहां बदले, ये अलग बहस की चीज है। वैसे ये दोनो बातें ही सच हैं। 

क्या हैं ये मूल्य? कुछ हैं भी या बेकार का सियापा है? जैनरेशन गैप का फंडा क्या है? कल जो बातें गलत थीं, वो क्या आज सही हैं? क्या हम तर्कों का सहारे अपने को भ्रमाते हैं? क्या ये तर्क देकर हम अपने अंदर ही उठते सवालों से मुंह चुराते हैं? क्या इन तर्कों का कोई मतलब भी होता है? क्या इन तर्कों की जरुरत है भी कि नहीं?  इस सबपर चर्चा करुंगा, बिंदास करूंगा, अगली पोस्टों में...पर कब ये मत पूछना कोई? ..हां..ब्लॉग पर राजनीतिक बातों के लिए सख्ती के साथ कुछ समय के लिए नो एंट्री का बोर्ड  लगा कर बाहर का रास्ता दिखा दिया है।  

(क्रमश:)

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