गुरुवार, अक्तूबर 11, 2018

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते


   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो, एक गोली देता था, या इंजेक्शन लगाता था और बीमारी छूमंतर हो जाती थी। कितनी भी गंभीर हालत हो, फैमली डॉक्टर एकदम आखिर में ही जाकर अस्पताल में भर्ती करने को कहता था। इन फिल्मों के डॉक्टर भले, मृदभाषी और नि:स्वार्थ भाव से काम करते थे। कई केस में तो डॉक्टर दवा लिखते वक्त कहता था, कि अगली बार बिना पैसे के वो दवा नहीं लिखेगा, फिर भी लिखता था। सबसे मस्त बात ये होती थी कि जिस बीमारी का इलाज भारत में संभव नहीं होता था, उस मर्ज का दुनिया का नंबर वन डॉक्टर एकदम मौके पर उसी शहर में होता था। वो भी तुरंत-फुरत सफल ऑपरेश्न कर देता था। मरीज जिस भी शहर में होता था, वहां सबकुछ उपलब्ध भी हो जाता था। या फिर कहें, कि ये डॉक्टर का चमत्कार होता था, कि वो जो उपलब्ध होता था, उससे चमत्कारिक ऑपरेशन कर डालता था।
    कितना आसान होता था फिल्मों में। इन्ही फिल्मों ने डॉक्टर को भगवान बनाया। डॉक्टर को कभी गलती न करने वाला इंसान बनाया। मानवता के लिए हर हाल में, हर जगह पहुंचने वाला फरिश्ता बनाया। फिल्मों में डॉक्टरों के दो-तीन चिरपरिचत डॉयलॉग भी होते थे। “मेरे हाथ में जो था, वो मैं कर चुका हूं, अब सबकुछ ऊपर वाले के हाथ में है”, या फिर “सॉरी, हम मरीज को बचा नहीं सके। ये डॉयलॉग हर फिल्म में होते थे। आज भी कई फिल्मों में होता है, हम फिर भी इन डॉयलॉग को लेकर बोर नहीं होते, शिकायत नहीं करते।
   जानते हैं क्योंक्योंकि मौत ही एक ऐसी चीज है, जिसपर कोई प्रश्न चिन्ह लगाना हमारे वश में नही है। डॉक्टर इस रंगीली दुनिया और मौत के बीच जिन्दगी की जंग लड़ने वाला यौद्धा का प्रतीक। जब ये यौद्धा सॉरी कह देता था, तो फिल्म करुणा के सागर में डूब सी जाती थी। 
   काश असल जिन्दगी में भी ऐसा ही होता। कई मसलों पर फिल्मी डॉक्टर सरीखे फरिश्ते, सही वक्त पर मिल जाते। जिन्दगी कुछ नहीं, बहुत आसान हो जाती। खैर जिन्दगी तो रील नहीं, रियल होती है। हकीकत की जमीन पर मखमली घास की चादर नहीं होती।
 आदर्श और लोकव्यवहार जिन्दगी को संचालित करते हैं। इसलिए कहते हैं कि आदर्श और लोकव्यवहार अलग-अलग होते हैं। जिन्दगी में हर कुछ स्याह या सफेद नहीं होता। हर किसी कि जिन्दगी इसी तरह होती है। अपने मूल्य, अपनी सहूलियत, अपनी इच्छा, अपनी खुशी, ये ही जिन्दगी में सबसे आगे है। जबतक आपके मूल्य, आपकी जीवन जीने का तरीका, दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न करे, तबतक सब  सही होता है। पर दुनिया है, ये दुनिया दूसरों के सुख से ही ज्यादा दुखी होती है। ऐसे में जब आप दुख में होते हो तो आप ही दुखी होते हैं, दुनिया सुखी होती है। 
   नवरात्र के दिन शुरु हो गए हैं। माता के 9 रूपों का दिन। आज दूसरा दिन है। माता का हर रूप पूज्नीय है। माता शक्ति का प्रतीक है। जगतजननी माता से आप सभी के लिए शांति, समृद्धि, अच्छाई करते रहने की ताकत और स्वस्थय जीवन की कामना करता हूं। साथ ही मां दुर्गा से प्रार्थना करता हूं कि असल जिन्दगी में वो फिल्मी फरिश्ते आपसे, मुझसे हर मोड़ पर मिलते रहें। आमिन



मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...